सुर्खियों से दूर रहे स्वातंत्र्यवीर : श्री मांगीलाल गुहे


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श्रीयुत पं. मांगीलाल गुहे 
पिता स्व.शिवकरण गुहा 
जन्म :- 10.10.1926,
जन्म स्थान :- हरदाविचारधारा :- गांधीवादी,
श्रीयुत मांगीलाल जी गुहे को भारत के महमहिम राष्ट्रपति ने 13.08.2013 को सम्मानित किया उनके इस यश की अर्चना की नार्मदीय ब्राह्मण समाज जबलपुर ने कर्मयोगी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव.पर आयोजित एक आत्मीय आयोजन में किया .   श्रीयुत गुहे ने गांधी जी के निर्देशों पर सदा अमल किया1942 में महा. गांधी के “करो या मरो” नारे से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार की पत्राचार व्यवस्था को खत्म करने हरदा के लेटर बाक्सों को बम से नेस्तनाबूत किया,साथ ही डाक गाड़ी के दो डब्बों के बीच यात्रा करते हुए रस्सी में हंसिया बांध कर रेल लाइन के किनारे के टेलीफ़ोन तारों को काटा ताकि टेलीफ़ोनिक एवम टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था छिन्न भिन्न हो हुआ यही .उनकी ज़रा सी चूक जान लेवा हो सकती थी. पर युक्तियों और सतर्क व्यक्तित्ववान श्री गुहे ऐसा कर साफ़ बच निकले. 
       श्री गुहे बताते हैं कि मुझसे लोग दूरी बनाते थे . ऐसा स्वभाविक था. लोग क्यों अग्रेजों के कोप का शिकार होना चाहते. 
श्रीयुत गुहे हमेशा कुछ ऐसा कर गुज़रते जो विलायती कानून की खिलाफ़त और बगावत की मिसाल होता पर हमेशा  वे सरकारी की पकड़ में नहीं आ पाते .कई बार ये हुआ कि अल्ल सुबह हरदा की सरकारी बिल्डिंग्स पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा दिखाई देता था. ये करामात उसी क्रांतिवीर की थी जिसे तब उनकी मित्र मंडली मंगूभाई के नाम से सम्बोधित पुकारती थी.उनका एक ऐसा मित्र भी था जो सरकारी रिश्वत की गिरफ़्त में आ गया उसने श्री गुहे को बंदी बनवा दिया. जब मैने मित्र के नाम का उल्लेख करने की अनुमति चाही तो दादाजी ने कहा-“मुझमें किसी से कोई रागद्वेष के भाव नहीं मैं तो देश को आज़ाद हवा दिलाना चाहता था मेरा उद्देश्य पूर्ण हुआ.मै उसे आज भी मित्र मानता हूं हो सकता है कि उसका परिवार मेरी गिरफ़्तारी के धन से भोजन कर सका हो.अथवा उसकी ज़रूरते पूरी हुईं हों. .!”
ऐसे महान विचारक श्रीयुत गुहे जी पर हमें गर्व है.
  साथ ही टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने हंसिये को रस्सी से बांधकर हावड़ा मेल में बैठकर रेलवे लाइन के किनारे वाले टेलीफ़ोन के तार घात लगाके काटे जो एक दुस्साहसिक कार्य था. श्री गुहे जी को उनके एक सहयोगी आंदोलनकारी ने अंग्रेज सरकार से रिश्वत लेकर जेल भिजवाया. वे 21 माह तक जेल में रहे ….

सदा ही हौसलों से संकटों समस्याओं को चुनौती देने वाले श्री गुहे जी का जन्म 10 अक्टूबर 1926 को हरदा में हुआ. आपके पिता श्री शिवचरण गुहे कृषक थे.ये दौर भारतीय कृषकों के लिये अभाव एवम संघर्ष का दौर था. एक ओर अभाव दूसरी ओर सामाजिक अंग्रेज़ सरकार की दमनकारी नीतियों से किशोरावस्था में ही विद्रोही हो गये थे गुहे जी. गांधीजी के आह्वानों का असर उनके किशोर मन पर अवश्य पड़ता था. मुझसे उनकी हुई कई वार्ताओं में अक्सर मुझे महसूस हुआ कि कभी भी अन्याय को सहन न करने वाले दादा जी का सेनानी होना स्वभाविक ही रहा होगा.उनके संवादों में सादगी, लोगों के प्रति विश्वास का भाव उनकी गुणात्मक विशेषता थी. स्वभाव से घुमक्कड़ श्री गुहे ने सारे देश का भ्रमण किया तीर्थ यात्राएं तो एकाधिक बार कर चुके थे.

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सुर्खियों से दूर रहे स्वातंत्र्यवीर : श्री मांगीलाल गुहे


 

श्रीयुत पं. मांगीलाल गुहे 
पिता स्व.शिवकरण गुहा 
जन्म :- 10.10.1926,
जन्म स्थान :- हरदाविचारधारा :- गांधीवादी,
श्रीयुत मांगीलाल जी गुहे को भारत के महमहिम राष्ट्रपति ने सम्मानित किया उनके इस यश की अर्चना की नार्मदीय ब्राह्मण समाज जबलपुर ने कर्मयोगी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव.पर आयोजित एक आत्मीय आयोजन में किया .   श्रीयुत गुहे ने गांधी जी के करो या मरो नारे पर अमल किया1942 में महा. गांधी के “करो या मरो” नारे से प्रभावित होकर अंग्रेज सरकार की पत्राचार व्यवस्था को खत्म करने हरदा के लेटर बाक्सों को बम से नेस्तनाबूत किया,साथ ही डाक गाड़ी के दो डब्बों के बीच यात्रा करते हुए रस्सी में हंसिया बांध कर रेल लाइन के किनारे के टेलीफ़ोन तारों को काटा ताकि टेलीफ़ोनिक एवम टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था छिन्न भिन्न हो हुआ यही .उनकी ज़रा सी चूक जान लेवा हो सकती थी. पर युक्तियों और सतर्क व्यक्तित्ववान श्री गुहे ऐसा कर साफ़ बच निकले. 
       श्री गुहे बताते हैं कि मुझसे लोग दूरी बनाते थे . ऐसा स्वभाविक था. लोग क्यों अग्रेजों के कोप का शिकार होना चाहते. 
श्रीयुत गुहे हमेशा कुछ ऐसा कर गुज़रते जो विलायती कानून की खिलाफ़त और बगावत की मिसाल होता पर हमेशा  वे सरकारी की पकड़ में नहीं आ पाते .कई बार ये हुआ कि अल्ल सुबह हरदा की सरकारी बिल्डिंग्स पर यूनियन जैक की जगह तिरंगा दिखाई देता था. ये करामात उसी क्रांतिवीर की थी जिसे तब उनकी मित्र मंडली मंगूभाई के नाम से सम्बोधित पुकारती थी.उनका एक ऐसा मित्र भी था जो सरकारी रिश्वत की गिरफ़्त में आ गया उसने श्री गुहे को बंदी बनवा दिया. जब मैने मित्र के नाम का उल्लेख करने की अनुमति चाही तो दादाजी ने कहा-“मुझमें किसी से कोई रागद्वेष के भाव नहीं मैं तो देश को आज़ाद हवा दिलाना चाहता था मेरा उद्देश्य पूर्ण हुआ.मै उसे आज भी मित्र मानता हूं हो सकता है कि उसका परिवार मेरी गिरफ़्तारी के धन से भोजन कर सका हो.अथवा उसकी ज़रूरते पूरी हुईं हों. .!”
ऐसे महान विचारक श्रीयुत गुहे जी पर हमें गर्व है.
  साथ ही टेलीग्राफ़िक संचार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने हंसिये को रस्सी से बांधकर हावड़ा मेल में बैठकर रेलवे लाइन के किनारे वाले टेलीफ़ोन के तार घात लगाके काटे जो एक दुस्साहसिक कार्य था. श्री गुहे जी को उनके एक सहयोगी आंदोलनकारी ने अंग्रेज सरकार से रिश्वत लेकर जेल भिजवाया. वे 21 माह तक जेल में रहे ….

तुम परसाई जी के शहर से हो..?


 

तुम परसाई जी के शहर से हो..?
न …!
जबईपुर से हो न….?
हां….!
तो उनका ही शहर है न…!
न पत्थरों का है…!
हा हा समझा तुम उनके शहर के ही हो..
न…
उनके मुहल्ले का हूं.. राइट टाउन में ही रहते थे. उनके हाथ की गटागट वाली गोली भी खाई है. बचपने में. कालेज के दिनों में तो उनका कद समझ पाया था. सो बस उनके चरणों की तरफ़ बैठने की इच्छा हुआ करती थी. 
   परसाई जी पर बतियाते बतियाते जबलपुर प्लेट फ़ार्म पर गाड़ी आ टिकी… चाय बोलो चाय गरम. के अलावा और भी कुहराम सुनाई पड़ा भाई.. आपका स्टेशन आ गया.. आप तो घर पहुंच जाओगे मुझे तो कटनी से   उत्कल पकड़नी है. राम जुहार के बाद सज्जन से बिदा ली अपन भी निकल लिये. आधे घंटे बाद बीना एक्सप्रेस भी  निकल गई होगी.
 शहर परसाई का ही तय है… पर केवल परसाई का.. न उनको उनके समय नकारने वालों का भी है. अक्सर ऐसा ही होता है… जीवन काल में किसी को जो नहीं भाता उसे बाद में खटकता है..
ओशो परसाई के बीच तत्समय जो शिखर वार्ताएं हुआ करती थीं एक सकारात्मक साहित्य के रूप में उसे देखा समझा जा सकता है. परसाई जी और ओशो के जन्मस्थली  बीच कोई खास अंतर न था . होशंगाबाद के आस-पास की पैदाईश दौनो महर्षियों की थी. दौनों का व्यक्तित्व  सम्मोहक और अपनी अपनी खासियतों से लबरेज़ कहा जा सकता है. कल्पना वश दौनों की विचारशैलियों का सम्मिश्रण करना भी चाहो तो भी नर्मदा के दौनो तीर का मिलना सम्भव नहीं. पर क्रांतिकारी दौनों ही थे . एक ने परा को नकारने की कोशिश की तो दूसरे ने वर्तमान पर तीक्ष्ण वार करने में कोई कोताही नहीं बरती. टार्च तो दौनों ने बांटे . हां तो परसाई जी ने जो भी देखा लिक्खा अपनी स्टाइल में ओशो ने कहा अपनी स्टाइल में. पर आपसी वैचारिक संवादों से साहित्य-सृजन हुआ यह सच है.
                      परसाई जी का व्यंग्य करने का तरीका देखिये  “तस्करी सामान की भी होती है – और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है. कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, “मेरी उम्र एक हज़ार साल है. मैं हज़ार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था. ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है.” विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा – क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हज़ार साल है? तब चेला कहेगा, “मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्यों कि मैं तो इनके साथ सिर्फ़ पाँच सौ सालों से हूँ.” ” यहां समकालीन परिस्थिति पर प्रस्तुत वक्तव्य सार्वकालिक नज़र आ रहा है.
हां तो मित्रो मेरी मिसफ़िट बातों के बीच एक हक़ीक़त बताए देता हूं कि –
                             “परसाई के बाद कईयों की खूब चल निकली कई ने परसाई को ओढ़ा कई ने सिराहने रखा बस बिछा न पाये.. बिछा तो उनको जीते जी दिया था जबलपुर वालों नें.. बस छाती पे मूंग न दल पाए वैसे तो मूंग भी दल लेते पर मूंग क्या उनके मुंह मसूर के लायक न थे.. खैर छोड़ो परसाई की छाती पे दलहन दलने के जुगाड़ करने वालों में कई देवलोक वासी हो गए प उनका क्या जो परसाई को ओढ़ रहे हैं या सिराने रखे हैं.. अब इन महानुभावों पे क्या लिखूं.. इनका स्मरण कर उनके पुण्य स्मरण को आभासी नहीं बनाना चाहता हूं. एक प्रोफ़ेसर हैं बुंदेलखंड के न हरदा गये न टिमरनी ऐसा लिखा परसाई पे कि जैसे बस आज़ के वेद व्यास  वे ही हैं. किधर से का जोड़ा उनकी किताब में बांचते ही माथा पीट लिया.. परसाई जी का डी एन ए टेस्ट करने पे आमादा नज़र आए वो किताब में. आप तो जानते हो कि “गंज और नाखून” संग साथ होवें तो कितनी विषम स्थिति होती है  जी हां उतनी  ही मुश्किल जितना एक अधज्ञानी को कलम पकड़ा देने से होता है.
      ये कहना गलत है की परसाई किसी कुंठा का शिकार थे ऐसा मुझे नही लग रहा . आपकी आप जानें.  आपको लगे तो लगे.  समकालीन स्थितियां क्या थीं तब कमसिन न होता तो बयां अवश्य कर पाता पर जितना श्रुत हुआ उस आधार पर कह सकता हूं कि न तो परसाई जी की जमीन ओशो ने अपने नाम कराई थी न ही परसाई जी ने ओशो की दूकान से उधारी पे टार्च वगैरा ले गये थे.  पाज़िटिव नज़रिये से देखा जाए तो चेष्टा दौनों की सकारात्मक ही रही   परसाई जी और ओशो ऐसे चित्रक थे जो अपने अपने कैनवस पर रंग भरने में अपने अपने तरीके से तल्लीन रहे. पर फ़क्कड़ होने की वज़ह से मुझे सबसे क़रीब परसाई जी ही लगते हैं. सचाई को नज़दीक से महसूस कर  लिखने वाले परसाई जी ने भोलाराम के जीव देख कर व्यवस्था को जो तमाचा जड़ा उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.  पर मुए सरकारी लोग आज भी जस के तस हैं..
    बड़े साब छोटे साब,  बड़े बाबू छोटे बाबू आधारित व्यवस्था को बदलने की कोशिश परसाई जी ने तब कर  डाली थी जब  व्यवस्था में लचर पचर तत्व प्रारम्भ ही हुए थे.. अब उफ़्फ़ अब तो अर्रा सी रही है व्यवस्था..
   श्री लाल शुक्ल के रागदरबारी वाले  लंगड़ को नकल मिली तब जब कि वो चुक गया… उधर दबाव इतना बढ़ गया कि आप व्यवस्था को सुधार नहीं सकते व्यवस्था सुधारने के लिए आपको दायां बांया देखना होगा . न देखा तो दुर्गा शक्ति की मानिंद दबा दिये जाओगे. मीडिया की अपनी मज़बूरी है उसे भी नये विषय चाहिये.. नहीं तो कल आप खुद कहोगे क्या वही पुरानी चटाई बिछा देता है मीडिया… हम लेखकों की अपनी मज़बूरी हैं कित्ता लिखें हमारा लिखा कित्ते लोग बांचते हैं.. जो पढ़ते हैं वो केवल टाइम पास करते हैं.. यानी केवल चल रही है गाड़ी सब के सब फ़िल्म सियासत और स्टेटस से हट के कुछ सोचने समझने के लिये तैयार ही नहीं हैं ऐसे दौर में परसाई जी जैसा व्यक्तित्व अधिक आवश्यक है…परसाई के साहित्य में तलाश कीजिये परसाई जी को जो केवल मेरे जबलईपुर का नहीं पूरे देश का है.. बिहार के भी जहां मिड डे मील वाले बच्चों के जीव तड़प रहे हैं एक अदद न्याय के लिये…           

जिधर भी देखता हूँ , बस तुम्हारा ही उजाला है .


तस्सवुर में तुम्हारी सादगी का बोलबाला है
भरी थाली रुके हाथ जिसमें बस इक निवाला है !
दरो दीवार पे तुम्हारा मुस्कुराता अक्स देखा है…
जिधर भी देखता हूँ , बस तुम्हारा ही उजाला है .
ये दुनियाँ देख लगता – “हर ओर तुम ही हो ..”
चाँद,सूरज,धरा, तारे, सभी को तुमने पाला है .
तुम्हारे नेह का संदल मेरे हर रोम में बाक़ी –
जो जितना भी दिया तुमने उसे हर पल सम्हाला है.
अजन्मे देवता जलते हैं मुझसे जानता हूँ मैं –
मैं जब कहता हूँ मुझको मेरी माँ ने पाला है…!!

”चुगलखोरी के कीड़े के वाहक पिता भी हुआ करते हैं


उन चुगली पसन्द लोगों से भले वो जानवर लगतें हैं, जो चुगलखोरी के शगल से खुद को बचा लेते हैं। इसके बदले वे जुगाली करते हैं। अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने वालों को आप किसी तरह की सजा दें न दें कृपया उनके सामने केवल ऐसे जानवरों की तारीफ जरूर कीजिये। कम-से-कम इंसानी नस्ल किसी बहाने तो सुधर जाए। आप सोच रहे होंगें, मैं भी किसी की चुगली कर रहा हूँ, सो सच है परन्तु अर्ध-सत्य है !

                              इन दिनों चुगली करने वालों की नस्ल से चुगली के समूल विनिष्टीकरण की दिशा   जुटा हूँ । अगर मैं किसी का नाम लेकर कुछ कहूँ तो चुगली समझिये। यहाँ उन कान से देखने वाले लोगों को भी जीते जी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूँगा जो गांधारी बन पति धृतराष्ट्र का अनुकरण करते हुए आज भी अपनी आँखे पट्टी से बांध के कौरवों का पालन-पोषण कर रहें हैं ।  

      सचमुच उनकी ”चतुरी जिन्दगी“ में मेरा कोई हस्तक्षेप कतई नहीं है और होना भी नहीं चाहिए ! पर एक फिल्म की कल्पना कीजिए, जिसमें विलेन नहीं हो, हुजूर  ऐसी फिल्म को कौन फिल्म मानेगा ?  दैनिक जीवन में आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो अपने आप को हीरो-साबित करने के लिए आप जैसे सीधे साधे लोगों को विलेन बना के पहले पेश करते हैं । ताकि उनकी फ़िलम रिलीज़ होने के बाद जै संतोषी मां,नदिया के पार,नागिन,बाबी जैसी फ़िल्मों के रिकार्ड तोड़ दे और सदा ही टाक़ीजों में टिकी रहे अनंत काल तक. आपको विलेन बना के पेश करने की कला ही चुगली है. एक मित्र के एक आस्तीनियां मित्र ने   अन्यत्र तबादले पर जाने से पेश्तर फ़ोन करके चुगली की. तो एक दूसरा आस्तीनिया ससुरा चौंक गया ये जान के कि स्साला उसका वार खाली गया.. ! ऐसा सामान्यत: कम ही होता है पर ये भी सत्य है कि बहुधा ऐसे नपुंसक प्रजाति के चुगलखोर लोग खरोंच तो पहुंचा ही देते हैं.

                           ”चुगली` का बीजारोपण माँ-बाप करते हैं- अपनी औलादों में बचपने से-एक उदाहरण देखें, ”क्यों बिटिया, शर्मा आंटी के घर गई थी“, ”हाँ मम्मी शर्मा आंटी के घर कोई अंकल बैठे थे“।
अब ‘अंकल और शर्मा आंटी` के बीच फ्रायडी-विजन से देखती मैडम अपनी पुत्री से और अधिक जानकारी जुटाने प्रेरित किया जाओ अंकल का इतिहास, उनकी नागरिकता, उनका भूगोल पता लगाओ और यहीं से शुरू होता है चुगलखोरी का पहला पाठ ।
                                 इसमें केवल माँ ही उत्तरदायित्व निभाती है- ये भी एक अर्द्धसत्य है। पूर्ण सत्य यह है कि ”चुगलखोरी के कीड़े के वाहक पिता भी हुआ करते हैं.
हमें ”पल्स पोलियो“ अभियानों की तरह ”चुगलखोरी उन्मूलन अभियान“ चलाने चाहिए।
शासकीय कार्यालयों  बड़े संस्थानों में ऐसे इस अभियान   चलाने   बेहद ज़रूरी हैं.
                        मेरे दृष्टिकोण से आप सभी एकजुट होकर इस राष्ट्रीय अभियान को अपना लीजिए। अभियान के लिये-उन एन.जी.ओ. का सहयोग जुटाना न भूलें, जो अपने संगठनों के कार्यो की श्रेष्ठता सिद्ध करने दूसरों की (विशेषकर सरकारी सिस्टम की) चुगली करते हर फोरम पे नज़र आते हैं।
            मित्रों..! साहित्य, संस्कृति, कला, व्यापार, रोजिया चैनल, आदि सभी क्षेत्रों को लक्ष्य बनाकर हमें चुगली से निज़ात पाना  है। और हाँ जो चुगलियाँ गाँव से शहर के दफ्तरों में साहबों के पास लाई जातीं हैं  उनके वाहक भी हमारे प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए । 
              कैसे पिलाएँ चुगली की दो बूंदे-”सबसे पहले लक्ष्य को पहचानें, उसे कांफिडेन्स में लें  

   और उसका मुँह खुलवाएँ। बेहतर ढंग से सुने। जिसकी चुगली की जा रही है-उसे उसके सामने ले आएँ। फिर हौले से चुगलखोर की कही बातों में से दो बातें बूँदों की तरह सार्वजनिक करने की शुरूआत करें।“
इससे चुगलखोर के वस्त्र स्वयम् ही ढीले पड़ने लगेंगें । इतना ही नहीं चुगलखोर के  हाथ पाँव का फूलना, सर झुका लेना, माथा पकड़ना या हड़बड़ाकर ”हाँ…हाँ…हाँ….नहीं…नहीं..“ की रट लगाना  आदि बदलाव आप सहज देख सकेंगे. समझिये रोग ठीक होने जा रहा है.
     मित्रों, दफ्तरों में, बैठकों में, फोरमस् में, इस प्रयोग को करने से बड़े-बड़े की चुगलखोरों की चुगलखोरी का अंत सहज ही हो जाता है। चुगली का प्रसार का कारण किसी भी शरीर में कमीने पन ग्रुप  के विषाणु के आकस्मिक विस्तार से होता है. अगर इस पर समय रहते रोग प्रतिरक्षी टीके न लगवाए तो आपको भारी नुकसान हो सकता है. । इसका वाहक बेहद मीठा, आकर्षक, प्रभावशाली व्यतित्व वाली मानवीय काया का धारक हो सकता है। चुगली को कानूनी जामा भी पहनाया गया है।

सियासत का तो मूलाधार है ये। जहाँ सौभाग्यशाली लोगों को इससे बच सकने का मौका मिलता है। क़मोबेस सभी इस ”चुगली“ के शिकार हो ही जाते हैं। उधर समाजी रिवायतों की तो मत पूछिए – ”चुगली के बिना संबंध बनते ही नहीं। रहा तंत्र का सवाल सो – ”चुगली को शासन के हित में जारी सूचना की शक्ल में पेश करने वाले अधिकारी कर्मचारी, सफल एवं श्रेष्ठ समझे जाते हैं।
       सुधिजनों, अगर एक बार हिम्मत दिखा दी जावे तो सैकड़ों चुगली से प्रभावित ”जीव“ सुरक्षित हो जाऐगें ।

  क्या आप..! हां भई आप..!! अर्र भैये तुम जो इस आलेख को पढ़ रहे थे अब तक… चुगली विहीन भारत के पक्षधर हो तो आगे आओ .. न अभी नहीं तब आना जब तुम सबने कम से कम सात दिन से किसी की चुगली न की हो.. !

 

  • गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”
  • सम्पर्क   :- girishbillore@gmail.com
  • ट्विटर  :  @girishbillore
  • फ़ेसबुक  : girishmukul
  • ब्लाग    : मिसफ़िट

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वीरागंना रानी अवंती बाई का बलिदान सदैव स्मरणीय :मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान


 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि रानी अवंती बाई का बलिदान देशवासियों को देशभक्ति और परमार्थ के लिए जीवन जीने  की प्रेरणा देता रहेगा। रानी अवंती बाई ने 20 मार्च 1858 में अंग्रेजो से वीरतापूर्वक लड़ते हुये स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिये आत्मोसर्ग किया था। मुख्यमंत्री ने  प्रदेशवासियो की ओर से शहीद रानी की समाधि पर श्रृद्धा सुमन अर्पित किये। 
    मुख्यमंत्री श्री चौहान वीरागंना रानी अवंती बाई लोधी के बलिदान दिवस समारोह में उपस्थित जन समुदाय को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने शहीद स्थल पर पुष्पांजलि अर्पित कर रानी अवंती बाई की प्रतिमा का अनावरण किया। इस अवसर पर आदिम जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह ,पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्यमंत्री देवसिंह सैयाम मौजूद थे। समारोह की अध्यक्षता सांसद छत्रपाल सिंह ने की। राज्य सभा सदस्य फग्गन सिंह कुलस्ते,एवं विधायक गण भी उपस्थित थे। 
     मुख्यमंत्री ने कहा कि रानी के शहीद स्थल पर प्रतिवर्ष समारोह का आयोजन होगा। शहीद स्थल का विकास होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सभी स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों के अविस्मरणीय योगदान का उल्लेख करने का प्रयास किया जा रहा है। 

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मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश तेजी से प्रगति कर रहा है। प्रदेश की कृषि विकासदर 18 प्रतिशत से अधिक है। सभी ग्रामों में मई जून से 24 घंटे घरेलू विद्युत आपूर्ति होने लगेगी। उन्होंने कहा कि डिंडोरी के ग्रामीण इलाकों में 24 घंटे विद्युत प्रदाय का शुभारंभ करने वे पुनः यहॉ आयेंगे। 
    मुख्यमंत्री ने कहा राज्य शासन ने कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने, किसानों की सर्वांगीण उन्नति , अधोसंरचना विकास , गरीब के जीवन को सरल बनाकर उसे आगे वढ़ने का अवसर देने और युवाओं को स्वरोजगार में स्थापित करने की दिशा में विशेष ध्यान दिया है। 
    मुख्यमंत्री ने कहा ग्रामीण अंचल में 24 घंटे बिजली मिलने पर इस सुविधा का उपयोग प्रकाश के साथ स्वरोजगार के विस्तार में किया जाना चाहिए। गॉव-गॉव में लघु कुटीर उद्योग स्थापित होने चाहिए। एक अप्रेल से मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना शुरू होगी। जिसमें युवाओं को 25 लाख रूपये तक स्वरोजगार के लिए ऋण मिलेगा जिसकी गारंटी प्रदेश सरकार लेगी। राज्य सरकार प्रगतिशील -विकसित ग्रामों के लिए कृत संकल्पित है। ख्य मंत्री ने कहा गरीबों की महापंचायत बुलाई जायेगी। राज्य सरकार शीघ्र ही ऐसी योजना पर अमल करेगी जिससे गरीब परिवार भोजन की चिंता से पूरी तरह मुक्त हो जायेगा। उन्होंने कहा कि जो भी गरीब एवं आदिवासी परिवार जिस भूमि पर आवास बनाकर निवास कर रहा है उसे उस भूमि का आवासीय पट्टा दिया जायेगा। राज्य सरकार आदिवासियों के विकास और खुशहाली के लिए कोई कोर कसर नहीं रखेगी।

डिंडोरी को मिली सौगातें

मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि  बालपुर में सर्व सुविधा युक्त मंगलभवन का निर्माण कराया जायेगा  और शहीद स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर इसे पर्यटन स्थल घोषित कराने की कार्रवाई की जायेगी। शहीद स्थल में पर्यावरणीय वन विकसित कर उसे वीरांगना अवंती बाई वन का नाम दिया जायेगा। शाहपुर एवं बालपुर के बीच शहीद स्थल जाने  वाले मार्ग पर तोरण द्वार बनाने की घोषणा  के साथ बालपुर से रामगढ़ के बीच सड़क निर्माण को सप्लीमेंटरी बजट में शामिल किये जाने का आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि डिण्डौरी में स्थापित प्रतिमा का अनावरण निकट भविष्य में अटल ज्योति अभियान के शुभारंभ अवसर पर  किया जायेगा। मुख्यमंत्री  ने जिला प्रशासन द्वारा आयोजित लोककल्याण शिविर में किसानों को निशुल्क खसरे नक्षे की नकल के साथ ऋण पुस्तिका प्रदाय करने की व्यवस्था करने की निर्देश देते हुये किसानो से अपील की कि वे अपने अभिलेख साथ में लेकर जायें। 
दोपहर मुख्यमंत्री के हैलीपेड पॅहुचने पर आदिम जाति कल्याण  मंत्री श्री विजय शाह, जिले के प्रभारी मंत्री देव सिंह सैयाम, खनिज विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं लोधी क्षत्रिय सभा के संयोजक कोक सिंह नरवरिया, जिला पंचायत अध्यक्ष ओमप्रकाश धुर्वे जिला पंचायत मंडला की अध्यक्ष  श्रीमती सम्पतिया उइके, सहित जनप्रतिनिधियों , कलेक्टर मदन कुमार , पुलिस अधीक्षक मनोहर सिंह ने मुख्यमंत्री का स्वागत किया। हैलीपेड से मुख्यमंत्री सीधे समाधि स्थल पॅहुचकर  वीरागंना की समाधि में पुष्पचक्र अर्पित कर उनकी प्रतिमा का अनावरण किया।

कसम एक राष्ट्रीय खाद्यपदार्थ


राम धई, राम कसम, अल्ला कसम, रब दी सौं, तेरी कसम, मां कसम,पापा कसम, आदि कसमें भारत का लोकप्रिय खाद्य पदार्थ हैं. इनके खाने से मानव प्रजाति को बहुत कुछ हासिल होता है. चिकित्सालय में डाक्टर बीमारी के लिये ये खाना वो मत खाना जैसी सलाह खूब देते हैं पर किसी चिकित्सक ने कसम नामक खाद्य-पदार्थ के सेवन पर कभी एतराज़ नहीं जताया. न तो किसी वैद्य ने न हक़ीम ने, और तो और चौंगा लगा के फ़ुटपाथ पे ज़वानी बचाए रखने वाली दवा बेचने वाले भाईयों तक ने इसको खाने से रोका नहीं.
यानी कुल मिला कर क़सम किसी प्रकार से नुक़सान देह नहीं डाक्टरी नज़रिये से. क़ानूनी नज़रिये से देखिये फ़िल्मी अदालतों में कसम खिलावाई जातीं हैं. हम नौकरी पेशा लोगों से सेवा पुस्तिका में कसम की एंट्री कराई जाती है. और तो और संसद, विधान सभाओं , मंत्री पदों अन्य सभी पदों पर चिपकने से पेश्तर इसको खाना ज़रूरी है.
कसम से फ़िलम वालों को भी कोई गुरेज़ नहीं वे भी तीसरी कसम,कसम सौगंध, सौगंध गंगा मैया के …, बना चुके हैं. गानों की मत पूछिये कसम का स्तेमाल खूब किया है गीतकारों ने. भी.
मान लीजिये कभी ये राम धई, राम कसम, अल्ला कसम, रब दी सौं, तेरी कसम, मां कसम, जैसी जिन्सें आकार ले लें और ऊगने लगें तो सरकार कृषि विभाग की तर्ज़ पर “कसम-विभाग” की स्थापना करेगी बाक़ायदा . सरकार ऐसा इस लिये करेगी क्योंकि – यही एक खाद्य-पदार्थ है जो सुपाच्य है. इसे खाने से कब्ज़ जैसी बीमारी होना तो दूर खाद्य-जनित अथवा अत्यधिक सेवन से उपजी बीमारियां कदापि न तो अब तक किसी को हुई है न इन के जिंस में बदल जाने के बाद किसी को हो सकती है. चिकित्सा विज्ञान ने तो इस पर अनुसंधान भी आरंभ कर दिये हैं. बाक़ायदा कसम-मंत्रियों का पद भी ईज़ाद होगा. इसके लिये विधेयक संसद में लाया जावेगा.
पैट्रोल-डीज़ल-गैस की तरह इनकी कीमतों में बदलाव जब जी चाहे सरकार कर सकती है.
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनको कसम खाना भी नहीं आता दिल्ली वाले फ़ेसबुक स्टार
राजीव तनेजा इनमें से एक हैं सौगंध राम की खाऊं कैसे ? वे लिखते हैं अपनी कविता में
कारस्तानी कुछ बेशर्मों की
शर्मसार है पूरा इंडिया,
अपने में मग्न बेखबर हो ?
वीणा-तार झनकाऊं कैसे ?
सौगंध राम की खाऊं कैसे..?
इस तरह की लाचारी उनकी होगी जिनके पास हमारे मुहल्ले के पार्षद उम्मीदवार राम-रहीम की कसम खाने में *सिद्धमुख हैं. इस मामले में वे पूरे सैक्यूलर नज़र आते हैं आप समझ गए न कसम क्यों खाई जाती है.. कसम भी सेक्यूलर होती है.. ये तय है.. कभी कभी नहीं भी होती.

खैर ये जब होगा तब सोचिये अभी तो इससे होने वाले लाभों पर एक नज़रफ़ेरी कर ली जाए
सच्ची-कसमें- इस प्रकार की कस्में अब दुनियां के बाज़ार से लापतागंज की ओर चलीं गईं हैं. लापतागंज है कहां हमको नहीं मालूम.. जैसे झुमरी-तलैया के बारे में बहुत कम लोग जानतें हैं.. कई तो उसे काल्पनिक स्थान मान चुके है वास्तव मे विकीपीडिया के अनुसार “झुमरी तिलैया भारत के पूर्वांचल में स्थित झारखंड प्रांत के कोडरमा जिले का एक छोटा लेकिन मशहूर कस्‍बा है। झुमरी तिलैया को झुमरी तलैया के नाम से भी जाना जाता है। यहां की आबादी करीब 70 हजार है और स्‍थानीय निवासी मूलत: मगही बोलते हैं। झुमरी तलैया कोडरमा जिला मुख्‍यालय से करीब छ: किमी दूर स्थित है। झुमरी तलैया में करीब दो दर्जन स्‍कूल और कॉलेज हैं। इनमें से एक तलैया सैनिक स्‍कूल भी है।
दामोदर नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए बनाए गए तलैया बांध के कारण इसके नाम के साथ तलैया जुड़ा है। इस बांध की ऊंचाई करीब 100 फीट और लंबाई 1200 फीट है। इसका रिजरवायर करीब 36 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। काफी हरा-भरा क्षेत्र होने के कारण यह एक अच्‍छे पिकनिक स्‍थल के रूप में भी जाना जाता है।
झरना कुंड, तलैया बांध और ध्‍वजाधारी पर्वत सहित यहां कई पर्यटन स्‍थल भी हैं। इसके अलावा राजगिर, नालंदा और हजारीबाग राष्‍ट्रीय पार्क अन्‍य नजदीकी पर्यटन स्‍थल हैं। झुमरी तलैया पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्‍टेशन कोडरमा है जो नई दिल्‍ली-कोलकाता रेलमार्ग पर स्थित है।
झुमरी तलैया को अक्‍सर एक काल्‍पनिक स्‍थान समझने की भूल कर दी जाती है लेकिन इसकी ख्‍याति की प्रमुख वजह एक जमाने में यहां की अभ्रक खदानों के अलावा यहां के रेडियो प्रेमी श्रोताओं की बड़ी संख्‍या भी है। झुमरी तलैया के रेडियो प्रेमी श्रोता विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रमों में सबसे ज्‍यादा चिट्ठियां लिखने के लिए जाने जाते हैं।” वैसे ही लापतागंज जहां भी है है तो ज़रूर …. वहां सच्ची कसमें मौज़ूद हैं
झूठी कसमें :- ये हर जगह मौजूद हैं आप के पास भी.. मेरे पास भी .. इसे खाईये और अच्छे से अच्छा मामला सुलटाइये. सच मानिये इसे खाकर आप जनता को पटाकर आम आदमी (केजरी चच्चा वाला नहीं ) से खास बन सकते हैं. याद होगा श्री 420 वाले राजकपूर साहब ने मंजन इसी प्रकार की कसम खाकर बेचा था. आज़कल भी व्यापारिक कम्पनियां राजू की स्टाइल में पने अपने प्रोडक्ट बेच रहीं हैं. क्या नेता क्या अफ़सर क्या मंत्री क्या संत्री अधिकांश के पेट इसी से भरते हैं . खबरिया बनाम जबरिया चैनल्स की तो महिमा अपरम्पार है कहते हैं .. हमारी खबर सबसे सच्ची है.. ! देश का बच्चा बच्चा जानता है कि सच क्या है .
सेक्यूलर कसम :- इस बारे में ज़्यादा कुछ न कहूंगा. हम बोलेगा तो बोलेगे कि बोलता है.
दाम्पत्य कसम :- अक्सर पति पत्नी एक दूसरे के सामने खाते हैं जो उन सात कसमों से इतर होतीं हैं.. जो शादी-नामक भयंकर घटना के दौरान खाई जाती है.इस तरह की कसम पतिदेव को ज़्यादा मात्रा में खानी होती है. पत्नी को दाम्पत्य कसम कभी कभार खानी होती है .
इन लव कसम :- यह कसम यूं तो विवाह जोग होने के बाद आई एम इन लव की स्थिति में खाना चाहिये परंतु ऐसी कसम आजकल नन्हीं पौध तक खा रही है. एकता कपूर जी की कसम आने वाले समय में बच्चे ऐसी कसमें पालनें में खाएंगे.
सियासी-कसम :- सियासी कसम के बारे में भगवान कसम कुछ बोलने का मन नहीं कर रहा …!!
जो भी हो हम तो कसम के प्रकार बता रहे थे भगवान कसम भाववेश में कुछ ज़्यादा ही कह गए. माफ़ी हो. मुद्दे की बात ये है कि जो भी आजकल कसम खा रहा नज़र आए तो समझिये वो झूठा है. सच्ची वाली कसमें तो लापतागंज चलीं गईं.

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नोट-

· *सिद्धमुख =सिद्धहस्त की तरह का शब्द है. जिन लोगों में मुंह से हर काम निपटाने का हुनर आता है उनके मुंह सिद्धमुख होते हैं.

· इस आलेख का सारा कंटेंट होली का माहौल बनाने के लिये है जिसे बुरा लगा हो वो ऐसे आलेख न पढ़ने की कसम खा सकता है.