”चुगलखोरी के कीड़े के वाहक पिता भी हुआ करते हैं


उन चुगली पसन्द लोगों से भले वो जानवर लगतें हैं, जो चुगलखोरी के शगल से खुद को बचा लेते हैं। इसके बदले वे जुगाली करते हैं। अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने वालों को आप किसी तरह की सजा दें न दें कृपया उनके सामने केवल ऐसे जानवरों की तारीफ जरूर कीजिये। कम-से-कम इंसानी नस्ल किसी बहाने तो सुधर जाए। आप सोच रहे होंगें, मैं भी किसी की चुगली कर रहा हूँ, सो सच है परन्तु अर्ध-सत्य है !

                              इन दिनों चुगली करने वालों की नस्ल से चुगली के समूल विनिष्टीकरण की दिशा   जुटा हूँ । अगर मैं किसी का नाम लेकर कुछ कहूँ तो चुगली समझिये। यहाँ उन कान से देखने वाले लोगों को भी जीते जी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूँगा जो गांधारी बन पति धृतराष्ट्र का अनुकरण करते हुए आज भी अपनी आँखे पट्टी से बांध के कौरवों का पालन-पोषण कर रहें हैं ।  

      सचमुच उनकी ”चतुरी जिन्दगी“ में मेरा कोई हस्तक्षेप कतई नहीं है और होना भी नहीं चाहिए ! पर एक फिल्म की कल्पना कीजिए, जिसमें विलेन नहीं हो, हुजूर  ऐसी फिल्म को कौन फिल्म मानेगा ?  दैनिक जीवन में आप ऐसे लोगों से मिलते हैं जो अपने आप को हीरो-साबित करने के लिए आप जैसे सीधे साधे लोगों को विलेन बना के पहले पेश करते हैं । ताकि उनकी फ़िलम रिलीज़ होने के बाद जै संतोषी मां,नदिया के पार,नागिन,बाबी जैसी फ़िल्मों के रिकार्ड तोड़ दे और सदा ही टाक़ीजों में टिकी रहे अनंत काल तक. आपको विलेन बना के पेश करने की कला ही चुगली है. एक मित्र के एक आस्तीनियां मित्र ने   अन्यत्र तबादले पर जाने से पेश्तर फ़ोन करके चुगली की. तो एक दूसरा आस्तीनिया ससुरा चौंक गया ये जान के कि स्साला उसका वार खाली गया.. ! ऐसा सामान्यत: कम ही होता है पर ये भी सत्य है कि बहुधा ऐसे नपुंसक प्रजाति के चुगलखोर लोग खरोंच तो पहुंचा ही देते हैं.

                           ”चुगली` का बीजारोपण माँ-बाप करते हैं- अपनी औलादों में बचपने से-एक उदाहरण देखें, ”क्यों बिटिया, शर्मा आंटी के घर गई थी“, ”हाँ मम्मी शर्मा आंटी के घर कोई अंकल बैठे थे“।
अब ‘अंकल और शर्मा आंटी` के बीच फ्रायडी-विजन से देखती मैडम अपनी पुत्री से और अधिक जानकारी जुटाने प्रेरित किया जाओ अंकल का इतिहास, उनकी नागरिकता, उनका भूगोल पता लगाओ और यहीं से शुरू होता है चुगलखोरी का पहला पाठ ।
                                 इसमें केवल माँ ही उत्तरदायित्व निभाती है- ये भी एक अर्द्धसत्य है। पूर्ण सत्य यह है कि ”चुगलखोरी के कीड़े के वाहक पिता भी हुआ करते हैं.
हमें ”पल्स पोलियो“ अभियानों की तरह ”चुगलखोरी उन्मूलन अभियान“ चलाने चाहिए।
शासकीय कार्यालयों  बड़े संस्थानों में ऐसे इस अभियान   चलाने   बेहद ज़रूरी हैं.
                        मेरे दृष्टिकोण से आप सभी एकजुट होकर इस राष्ट्रीय अभियान को अपना लीजिए। अभियान के लिये-उन एन.जी.ओ. का सहयोग जुटाना न भूलें, जो अपने संगठनों के कार्यो की श्रेष्ठता सिद्ध करने दूसरों की (विशेषकर सरकारी सिस्टम की) चुगली करते हर फोरम पे नज़र आते हैं।
            मित्रों..! साहित्य, संस्कृति, कला, व्यापार, रोजिया चैनल, आदि सभी क्षेत्रों को लक्ष्य बनाकर हमें चुगली से निज़ात पाना  है। और हाँ जो चुगलियाँ गाँव से शहर के दफ्तरों में साहबों के पास लाई जातीं हैं  उनके वाहक भी हमारे प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए । 
              कैसे पिलाएँ चुगली की दो बूंदे-”सबसे पहले लक्ष्य को पहचानें, उसे कांफिडेन्स में लें  

   और उसका मुँह खुलवाएँ। बेहतर ढंग से सुने। जिसकी चुगली की जा रही है-उसे उसके सामने ले आएँ। फिर हौले से चुगलखोर की कही बातों में से दो बातें बूँदों की तरह सार्वजनिक करने की शुरूआत करें।“
इससे चुगलखोर के वस्त्र स्वयम् ही ढीले पड़ने लगेंगें । इतना ही नहीं चुगलखोर के  हाथ पाँव का फूलना, सर झुका लेना, माथा पकड़ना या हड़बड़ाकर ”हाँ…हाँ…हाँ….नहीं…नहीं..“ की रट लगाना  आदि बदलाव आप सहज देख सकेंगे. समझिये रोग ठीक होने जा रहा है.
     मित्रों, दफ्तरों में, बैठकों में, फोरमस् में, इस प्रयोग को करने से बड़े-बड़े की चुगलखोरों की चुगलखोरी का अंत सहज ही हो जाता है। चुगली का प्रसार का कारण किसी भी शरीर में कमीने पन ग्रुप  के विषाणु के आकस्मिक विस्तार से होता है. अगर इस पर समय रहते रोग प्रतिरक्षी टीके न लगवाए तो आपको भारी नुकसान हो सकता है. । इसका वाहक बेहद मीठा, आकर्षक, प्रभावशाली व्यतित्व वाली मानवीय काया का धारक हो सकता है। चुगली को कानूनी जामा भी पहनाया गया है।

सियासत का तो मूलाधार है ये। जहाँ सौभाग्यशाली लोगों को इससे बच सकने का मौका मिलता है। क़मोबेस सभी इस ”चुगली“ के शिकार हो ही जाते हैं। उधर समाजी रिवायतों की तो मत पूछिए – ”चुगली के बिना संबंध बनते ही नहीं। रहा तंत्र का सवाल सो – ”चुगली को शासन के हित में जारी सूचना की शक्ल में पेश करने वाले अधिकारी कर्मचारी, सफल एवं श्रेष्ठ समझे जाते हैं।
       सुधिजनों, अगर एक बार हिम्मत दिखा दी जावे तो सैकड़ों चुगली से प्रभावित ”जीव“ सुरक्षित हो जाऐगें ।

  क्या आप..! हां भई आप..!! अर्र भैये तुम जो इस आलेख को पढ़ रहे थे अब तक… चुगली विहीन भारत के पक्षधर हो तो आगे आओ .. न अभी नहीं तब आना जब तुम सबने कम से कम सात दिन से किसी की चुगली न की हो.. !

 

  • गिरीश बिल्लोरे “मुकुल”
  • सम्पर्क   :- girishbillore@gmail.com
  • ट्विटर  :  @girishbillore
  • फ़ेसबुक  : girishmukul
  • ब्लाग    : मिसफ़िट

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  • फ़ोन     :09479756905

 

 

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