सर्किट हाउस 11.10.2011


आज़ सारे लोग दफ़्तर में हलाकान है , कल्लू चपरासी से लेकर मुख्तार बाबू तक सब को मालूम हुआ जनाब हिम्मत लाल जी का आगमन का फ़ेक्स पाकर सारे आफ़िस में हड़कम्प सा मच गया. कलेक्टर सा’ब के आफ़िस से आई डाक के ज़रिये पता लगा अपर-संचालक जी पधार रहें किस काम से आ रहें हैं ये तो लिखा है पर एजेण्डे के साथ कोई न कोई हिडन एजेण्डा भी होता है …? जिसे वे कल सुबह ही जाना जा सकेगा .
दीपक सक्सेना को ज्यों ही बंद लिफ़ाफ़ा प्रोटोकाल दफ़्तर से मिला फ़टाफ़ट कम्प्यूटर से कोष्टावली आरक्षण हेतु चिट्ठी और मातहतों के लिये आदेश टाईप कर ले आया बाबू. दीपक ने दस्तख़त कर आदेश तामीली के वास्ते चपरासी दौड़ा दिया गया.
चपरासी से बड़े बाबू को मिस काल मारा बड़े बाबू साहब के कमरे में बैठा ही था मिस काल देख बोला :-सा’ब राम परसाद का मिसकाल है..!
दीपक:- स्साला कामचोर, बोल रहा होगा सायकल पंक्चर हो गई..?
मुख्तार बाबू ने काल-बैक किया सरकारी फ़ोन से .
’हां,बोलो…!’
’हज़ूर, श्रीवास्तव तो घर पे नहीं है..?
लो साहब से बात करो…मुख़्तार बाबू बोला,
रिसीवर लेकर दीपक ने अधीनस्त फ़ील्ड स्टाफ़ रवीन्द्र श्रीवास्तव की बीवी को बुलवाया फ़ोन पर :- जी नमस्ते नमस्ते कैसीं हैं बाभी जी आप..?
“ठीक हूं सर ये तो सुबह से निकलें हैं देर रात आ पाएंगे बता रहे थे आप ने कहीं ज़रूरी काम से भेजा है..?”
“अर्रे हां…. भेजा तो है याद नहीं रहा… सारी ठीक है भाभी जी आईये कभी घर सुनिता बहुत तारीफ़ करती हैं आपकी “
“जी, ज़रूर ….
राम परसाद को दीजिये फ़ोन..?”
कुर्सी पर लगभग लेटते हुए दीपक का आदेश रामप्रसाद के लिये ये था कि वो दीपक की जगह अब्राहम का नाम भर के आदेश तामीली उसके घर पर करा दे. “
“अब्राहम… फ़ील्ड से वापस आकर सोफ़े पे पसरा ही था कि रामप्रसाद की आवाज़ ने उसके संडे के लिये तय किये सारे कामों पर मानों काली स्याही पोत दी. उसने आदेश देखते ही ना नुकुर शुरु कर दी “अरे रामपरसाद श्रीवास्तव का नाम तुमने काटा मेरा भी काट के शर्मा का लिख दो ”
“सा’ब,रखना हो तो रखो, वरना लो साहब को मिस काल किये देता हूं… कहो तो…?
“अर्र न बाबा, वो तो मज़ाक कर रा था लाओ किधर देना है पावती..?”
लोकल-पावती-क़िताब आगे बढ़ाते हुए अब्राहम से पूछता है:-सा’ब,वो एम-वे वाला धंधा कैसा चल रा है”
मतलब समझते ही बीवी को आवाज़ लगाई:-भई, सुनती हो ले आओ एक टूथ-पेस्ट , अपने परसाद के लिये..! पचास का नोट देते हुए –’हां और ये ये लो रामपरसाद, आज़ बच्चों के लिये कुछ ले जाना. दारू मत पीना बड़ी मेहनत की कमाई है.
’जी हज़ूर…दारू तो छोड़ दी ? रामपरसाद ने हाथों में नोट लेकर कहा –अरे सा’ब, इसकी क्या ज़रूरत थी. आप भी न खैर साहबों के हुक़्म की तामीली मेरा फ़रज़ (फ़र्ज़) बनता है हज़ूर .
हज़ूर से हासिल नोट जेब में घुसेड़ते ही रामपरसाद ने बना लिया बज़ट , पंद्र्ह की दारू, पांच का सट्टा , दस का रीचार्ज,बचे बीस महरिया के हवाले कर दूंगा. जेब में टूथ-पेस्ट डाल के रवानगी डाल दी.
सुबह सरकारी फ़रमान के मुताबिक विभाग के अपर-संचालक हिम्मत लाल जी की जी अगवानी के लिये दीपक सक्सेना , अब्राहम, सरकारी गाड़ी से स्टेशन पर पहुंच चुके थे उन सबके पहले एक दम झक्कास वर्दी पर मौज़ूद था. वो भी गाड़ी .के आगमन के नियत समय के तीस मिनिट पहले. दीपक सक्सेना ने लगभग गरियाते हुए सूचित किया :-”ससुरा, अपने दोस्त के बेटे के रिसेप्शन में आया है. ”
अब्राहम ने पूछा :-तो मीटिंग लेगें.. और टूर भी नहीं ?
दीपक:-लिखा तो है फ़ेक्स में पर पर तुम्ही बताओ इतना सब कर पायेंगे. चलो आने पे पता चलेगा.
अब्राहम:-हां सर, वो प्रोटोकाल वाले बाबू से रात बात हो गई थी . कमरा नम्बर तीन और पीली-बत्ती वाली गाड़ी अलाट हो गई है. एस०डी०एम०सा’ब से भी बात हो गई थी.
दीपक:- सुनो भाई, तुम बाबू को कुछ दे दिया करो ?
अब्राहम:-देता हूं सर,
दीपक:- हां, तो पुन्नू वाली फ़ाईल का क्या हुआ…?
अब्राहम:- सर, हो जाता तो अप्रूवल न ले लेता आपसे.
इस हो जाता में गहरा अर्थ छिपा था. जिसे एक खग ने उच्चारित किया दूजे खग ने समझा.
दीपक:- हां. ये तो है.
अब्राहम:- सर, कोई मीटिंग नहीं तो चलिये मैं चर्च हो आऊंगा.
दीपक:- . अरे, जीजस नाराज़ न होंगें और अगर साहब नाराज़ हुए तो सब धरा रह जाएगा.
अब्राहम:- ओ के सर
दीपक:- ज़रा, ट्रेन का पता लगाओ ?
अब्राहम:- सर, वो गिरी जी को भी बुला लेते उसका स्टेशन पर अच्छा परिचय है..?
दीपक:- ओह तो तुम्हारा भी ज़वाब नहीं जाओ भाई जिससे मुझे घृणा है तुम तो बस ?
अब्राहम:- सारी सर !
दीपक:- आईंदा इस तरह के नामों का उच्चारण वर्ज़ित है.
दीपक का चिढ़ना स्वभाविक था. काम धाम का आदमी न था स्साला कमाई धमाई के नाम पे ज़ीरो इधर सर्किट-हाउस और बीवियों के खर्चे इत्ते बढ़े हुये थे कि गोया कुबेर भी उतर आए तो इन दौनों पे लगाम लगाने की ताक़त उसमें नहीं ऊपर से डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट का बढ्ता प्रचार सरकारी अफ़सरों और मुलाज़िमों की तो बस दुर्दशा समझिये. और सुबह सुबह उस नाकारा मरदूद का नाम लेकर सुबह खराब करदी . ज़ायका बिगाड़ू स्थिति से मुक्ति की गरज़ से अब्राहम डिप्टी एस एस के कमरे में तांक-झांक यूं कर रहा मानो गाड़ी इसी चेम्बर में छुपा के रखी हो.
“बोलिये”
कुछ नहीं सर वो इंदौर-बिलासपुर
भई, इनक्वैरी में पूछिये काहे हमारा टाईम खराब करतें हैं आप…?
विश्वकर्मा जी, मै गिरी साब का मित्र हूं..!
पहले देना था न रिफ़रेन्स आईये बैठिये – डिप्टी एस एस ने कहा.
डिप्टी एस एस की आफ़र की गई कुर्सी पर सवार अब्राहम बाहर खड़े यात्रियों को हिराक़त भरी नज़र से निहारने लगा इस बीच डिप्टी एस एस ने ट्रेन की पोज़ीशन ली पता चला कि नरसिंहपुर में बार बार चेन पुलिंग होने से गाड़ी समयसे एक घण्टा लेट हो रही है. अंदर की पक्की खबर मिलते ही अब्राहम तुरंत रवाना हुआ बिना आभार व्यक्त किये . उधर जिधर ए०सी० डब्बा रुकने के लिये रेलवे ने स्थान नियत पर दीपक एक अन्य महिला अधिकारी से गपिया रहा था,जिसका अफ़सर भी इसी से आने वाला था .
अब्राहम दीपक ने पूरे गब्बर स्टाईल में सवाल दागता है: ”क्या खबर लाये हो ?”
’सर, बस साढ़े छै: के बाद ही आयेगी .
बातों में खलल न हो इस गरज़ से दीपक ने अब्राहम की तरफ़ मुखातिब हो कहा:- ठीक है तो जाओ रामपरसाद को लेकर चाय ले आओ ?
लोक-सेवा आयोग इसी टाईप के क्लास टू अर्दलीयों की भर्ती करता है. जो हज़ूर का हुक़्म सर माथे लगाएं और फ़ौरन कूच करें आदेश के पालन के लिये.
दीपक की तरह कई और अफ़सर अपने अपने अफ़सरों को लेने आये थे जो आपस में दो या तीन के समूह में जन्मभूमि,डायरेक्ट-प्रमोटी,यहां तक कि जाति के आधार पर छोटे-छोटे खोमचों में जमा हो चुके थे, यानी खुले आम क्षेत्रीयता, जातिवाद,और तो और प्रमोटी-डायरेक्ट जैसे वर्ग-भेद का सरे आम प्रदर्शन . क्या कर होंगे मत पूछिये ब्रह्म-मूहूर्त में इन मरदूदों ने मुख्य प्लेटफ़ार्म पर मातहतॊं और पूर्ववर्ती अफ़सरों और अपने अपने बासों की इतनी चुगलियां कीं कि सारा वातावर्ण नकारात्मक उर्ज़ा से सराबोर हो गया.
दीपक जी चाय पिला रहें है इस बात की खबर बोपचे साब को मिली तुरंत पहुंच गये सलामी देने
अरे भई ,सक्सेना जी, कैसे सुबह सुबह ?
नमस्कार,अपर-संचालक महोदय आ रहें हैं आप कैसे ..?
बोपचे ने मैडम को सर-ओ-पा भरपूर निहारते हुए कहा:- बस हम भी ऐसे ही मंत्री जी के पी ए का साला और उसकी पत्नी आ रहे हैं. उनको तेवर में माता जी के दरबार में कोई मनता पूरी करनी है सो हम आए हैं चाकरी को . अब बताएं हमारे कने कौन सा गाड़ी घोड़ा है जो ये सब करतें फ़िरें. फ़िर भी ससुरे छोड़ते कहां हैं..?
जी सही कहा..! मैडम और दीपक ने हां हुंकारा किया. तभी अब्राहम चाय लेकर आया पी एस सी सलैक्टेट अर्दली था सो समझदारी से दो की जगह चार चाय ले आया.
बोपचे:- ई अब्राहम बहुतई काम के अफ़सर हैं बहुत बढ़िया चाय ले आये गुप्ता कने से लाए हो का…?
“हां, सर ” अब्राहम बोला
अरे भई सक्सेना जी, बड़े भाग तुम्हारे जलवे दार विभाग मिला है- गाड़ी घोड़ा, अपरासी-चपरासी, और……..!
दीपक : ( बोपचे इस और को परिभाषित न कर दे इस भय से ) और क्या विभाग की बदौलत चुनाव में हार जीत होती है कौन सरकार इसे हरा न रखेगी … बताईये कोई और सेवा हो तो
अरे वाह दीपक जी सेवा क्या बस गाड़ी की झंझट है..? आज़ बस के लिये.
ठीक है, किये देता हू व्यवस्था..दीपक के लिये अच्छा मौका था गिरी को रगड़ने का मोबाईल लगाया उधर फ़ोन उठते ही :- ’नमस्ते नमस्ते कैसे हो अच्छा एक काम करना दस बजे सर्किट हाउस में गाड़ी भेज देना क्यों बोप…
बोपचे : न भाई नौ बजे ठीक नौ बजे
दीपक:- यार दस नहीं नौ बजे डाट नौ बजे हां बोपचे साब के पास गाड़ी भेज देना ? क्या , ड्रायवर नहीं आएगा ? अरे सरकारी काम है बुलाओ साले को . हम भी तो सन डे को खट रये हैं क्या बीवी बीमार है उसकी ..? तो मैं क्या करूं प्रायवेट लगा के भेजो कुछ खर्च कर लिया करो जानते नहीं “प्रौढ़ शिक्षा मंत्री” के रिश्तेदार आने हैं. बेचारे बोपचे जी ने कहा है,पहली बार. बात ज़्यादा न बढ़ाते हुये फ़ोन काटते ही बोपचे से बोला:- ये स्साला गिरी जो है न इतने कानून बताता है कि संविधान की संरचना करने वाले का अवतार हो ? साला नटोरिअस प्रमोटी है न तीनों खिल खिला के हंस दिये.
दीपक और मैडम तनु लोक सेवा आयोग की परीक्षा में साथ साथ थे. पास भी साथ-साथ हुए. तनु भी दीपक पर मोहित तो थी किंतु दीपक के बापूजी की बगावत के चलते मिलन पूरा न हुआ. पर पैंच आज़ भी लड़ा लेतें हैं दौनों. पहला इश्क़ दौनों को भुलाए न भूल पाता उस पर पोस्टिंग भी प्राय: पास में ही हो जाती है. खैर सरकारी काम की आड़ में जो भी होता है वो सरकारी तो होता है. इससे किसी को क्या आपत्ति होने चली. तनु को मालूम है कि व्यक्तित्व के हिसाब से दीपक को बेमेल बीवी मिली. जिसे वो ढो रहा है. दिल आज़ भी तनु की संदूकची में बंद है. तनु भी अपने मिसफ़िट पति को ढो ही रही थी. पर क्या करें पति से सात वादे जो कराए उस पोपले पंडत ने कब का मर गया वो पंडित खैर जो भी हो ज़िन्दगी ने रुतबा दिया, कमाई का बेहतरीन ज़रिया दिया तो फ़िर काहे की चिंता अब जिसका हसबैण्ड गंजा हो तो क्या हसबैंड न होगा बस न्यूनतम मुद्दों पे समझौता कर तनु बस सपनों में याद कर लेती है उधर दीपक भी गा लिया करता है “तुम होती तो ऐसा होता तुम ये कहतीं तुम वो करतीं आदि आदि..!”
दुनियां भर में जहां सरकारी काम काज कानूनों के सहारे चलते हैं वही दूसरी और भारत में हर व्यवस्था क़ायदों से चला करती है. क़ानून ये है कि हज़ूर आयें तो कोई ज़रूरत नहीं कि उनके हर आगमन का सरकारी करण हो.,किंतु कायदा ये है कि “हज़ूर की हर यात्रा का सरकारी करण हो और माहहतों द्वारा उनकी जी हज़ूरी में कोई कमी न हो ” अब आप समझ ही गये होंगे कानून और क़ायदे का समीकरण. कानून संविधान की ॠचाएं हैं तो कायदा राज शाही की का अनुवाद है.
नौकरी तो पिता जी किया करते थे सर उठा के. हमारे दौर में तो कितनी डिग्री दुम उठाना है कितनी नहीं हज़ूरों की अनुमति पे निर्भर करता है. खैर इस का विशद विश्लेषण अन्य अध्यायों में होगा अभी तो दीपक की रोमांटिक सुबह की तरफ़ चलते हैं
गाड़ी का अगले पंद्रह मिनिट में प्लेट फ़ार्म पर आ जाएगी ये खबर न तो दीपक सर को अच्छी लगी और नही तनु मैडम को अब्राहम इसी बात की पड़ताल कर रहा था कि हाय इन दो बगुला-बगुली का जोड़ा काहे बिछड़ गया . प्रभू के खेल कितने निराले हैं.
अब्राहम का दिमाग फ़्रायड की तरह जुगाली करने में बिज़ी हो चुका था. शेर छाप बीड़ी का एड को ताकते ताकते विचारों की जुगाली किये जा रहा था कि राम परसाद बोला:-’सा’ब,गाड़ी आ गई..!
राम परसाद की सूचना से साधना-भंग होते ही पुन: अपनी औकात में लौट आए साहब के पास दौड़ते हुए पहुंचा. तीनों ए०सी० के सामने आते ही लगभग कोच को प्रणाम की मुद्रा में देख रहे थे गोया… जगन्नाथ के रथ को निहार रहे हों. कोच से साहब का न निकलना उनको परेशान कर गया. कुछ देर बाद मोबाईल ने गुदगुदी की सो दीपक ने फ़ोन उठाया :-“सर,”“हां सर, आप नहीं आये क्या पूरा कोच खाली हो गया ?”
भई,सक्सेना, तुम बे अक्ल हो मुझे फ़ोन करना था न …?
यस सर सारी सर क्या हुआ…आप नहीं आए ?
अरे भई, सी एस मीटिंग इमर्जैन्सी मीटिग ले रहे हैं आप ट्रेन से मैडम को उतरवा लो. यलो सूट में हैं.
कोच में घुसते ही दीपक को तीन पीले सूट वाली देवियों को निहारा दूसरी वाली बेहद बेतकल्लुफ़ी से पसरीं थी बस पारखी नज़रों ने पहचान लिया और एक हल्की मुस्कान के साथ गुड मार्निंग मै’म शब्द उगल दिया जिसके जवाब में उनके पास सवाल ही लौटा :- तो आप हैं दीपक जी
यस,मै’म
मैडम का दृष्टिकोण सभी के प्रति एक समानता का था. उनके मन में प्रथम श्रेणी और चतुर्थ के मध्य कोई अंतर न समझ में आता आदेश दिया ये ये और हां वो वाला मेरा सामान है . तीनों से दो ने क्रमश: पदानुक्रम में बारी बारी से भारी , हल्का सामान उठा लिया. सबसे हल्का सामान पानी की बाटल दीपक को पकड़ा दी इस तरह सभी के हाथ काम के सरकारी नारे को बुलंद करती “मै’म” शान से सबसे आगे हो लीं शान से आहिस्ता आहिस्ता कोच से प्लेट फ़ार्म पर आ चुकीं थीं. सारा सामान चैक कर लिया न प्लेटफ़ार्म पर आते ही आदेश हुआ.
जी फ़िर भी कुछ या आ रहा हो बताऎं मै’म ? इस बार अब्राहम ने पूछा..
अरे, वो लेज़ का पैकेट और एक मेगज़ीन है
ओ के मै’म देखता हूं, कह कर अब्राहम गाड़ी कोच में पुन: प्रविष्ठ हुआ हां हाथ का वैनिटी-बाक्स दीपक को थमाना न भूला. यह भी कहना न भूला कि आप लोग चलिये मैं आता हूं. यानी कुल मिला के दीपक बाटल और वैनिटी बाक्स ढोयेंगे अब…!!
लेज़ का पैकेट और वूमेन मेगज़ीन लेकर अब्राहम तब ट्रेन के कोच से उतरा जब उसने यह देख न लिया की सारी पीठें गेट की ओर जा रहीं हैं. और फ़िर हौले-हौले लगभग सरकता हुआ चल पड़ा. कैलकुलेशन के मुताबिक जब उसे समझ आया कि अब कार तक पहुंच गये होंगे लोग चाल तेज़ करके पहुंच गया और हांफ़ने का अभिनय भी किया. जाते ही बोला :-मैगज़ीन तो मिल गई थी पर ये लेज़ नहीं दिख पा रहा था उपर वाली सीट पर मिला..बमुश्किल ?
अपने बास दीपक से बाटल और वैनिटी बाक्स जो ढुलवाना था. मैम कार में सवार, उसके आगे पायलट करता दीपक सबसे पीछे अब्राहम की गाड़ी. पाछ मिनट बाद ही सर्किट-हाउस के पोर्च में रुकी गाड़ी रूम नम्बर… में घुस गईं मै’म यह कहते हुये दस बजे आ जाईये और हां शादी में शाम पांच बजे जाना है तब तक मार्बल-राक्स घूमना था. हां, नाश्ते में एग और ब्रेड-बटर बस .
अब्राहम ने रहमान को सब समझा दिया रामपरसाद की ड्यूटी पूरादिन सर्किट हाउस के लिये तय थी .
पूरा दिन चाकरी में जुटे इन तीनों ने मैडम के हर आदेश का पालन राजाग्या मान के किया. भेड़ाघाट विज़िट, शापिंग आदि के फ़लस्वरूप बिलासपुर इंदौर एक्सप्रेस से वापसी के लिये पहुंचने तक मै’म की डाक दुगनी हो चुकी थी .
कुल मिला कर “रुपये…..” का उपरिव्यय.
सोमवार सरकारी अवकाश था. मंगल को दीपक और जूनियर अफ़सर ने अपने अपने दफ़्तर में जाकर उन फ़ाईलों को गति दी जिनसे “उपरिव्यय समायोजित होंगे ”
सर्किट-हाउस
अध्याय दो

जुगाड़,इंतज़ाम,व्यवस्था, कानून की ज़द में न हो तो भी क़ानून की ज़द में लाकर करो यही है सरकारी चाकरी का सूत्र हैं.
इन सूत्रों का प्रयोग करते जाइये नौकरी करते जाइये. ये शिक्षा दे रहे थे तहसीलदार जो अपने समकक्ष अधिकारीयों कोअधीनस्त समझते थे,राजस्व विभाग के ये साहब अपने आप को सरकार की सगी औलाद और अन्य विभाग के अफ़सरों और कर्मचारियों को सरकार की सौतेली औलाद मानने वाले ये तहसीलदार साब तो क्या इनका रीडर भी अपनेइलाके के अन्य विभागों को अपनी जागीर मानता है .इसी बातचीत के दौरान टेबल पर रखा फ़ोन मरघुल्ली आवाज़ मेंकराहा. बड़े घमंड से फ़ोन उठाया गया यस सर ,जी सर, ओ के सर , और फ़िर सर सर ! जी इसके अलावा किसी ने कुछ नहीं सुना. फ़ोन बंद करके तहसीलदार बोला – सी०एम सा’ब हैलीकाप्टर से इसी हफ़्ते भ्रमण पर हैं. एस०डी०एम० सा’ब मीटिंग लेंगें आप आ जाना गुरुवार को .बी०डी०ओ० बोला : जी,ज़रूर बाकियों ने हां में हां मिलाई. चाय-पानी के बाद सभा बर्खास्त हो गई. पौने पांच बज चुके थे सबकी तन्ख्वाह जस्टीफ़ाईड हुई सब निकल पड़े अपने अपने बंगलों में. बंगले क्या बाहर से बूचड़ खाने नज़र आते थे. बरसों से उसी पीले रंग से रंगे जाते थे वो भी दीवाली के बाद. जब टेकेदार की बाल्टी-कूची से जिला और सब डिवीजन लेबल तक को पीला किया जा चुका होता था.बचा खुचा रंग पावर के हिसाब से सबसे पहले तहसीलदार, फ़िर नायब, फ़िर बी०डी०ओ० फ़िर बचा तो बाक़ी सबके बंगलों में कूची फ़ेरने की रस्म अदा हो जाया करती थी.
गुरुवार को खण्ड स्तर के सारे अधिकारी सरकार के दरबार में पहुंच गये. तहसीलदार यानी रुतबेदार के आफ़िस में एस०डी०एम० कलैक्टर सा’ब के नुमाइंदे के तौर पर पधारे. आई०ए०एस०थे सो डाक्टर,एस०डी०ओ०पी०,थाना प्रभारी,परियोजना अधिकारी, कृषि-अधिकारी, बी०ई०ओ० सब बिफ़ोर टाईम. गुरुवार को भी दाढ़ी बना के भागते चले आये.वरना गुरुवार को न तो नाई की दूकान की तरफ़ झांकते और न ही सेविंग किट की याद ही करते . डा०मिश्रा आते ही बोले :- गुरुवार, को सेविंग करना पड़ा बताओ. नौकरी में धरम-करम सब चट जाता है
गुप्ता बी०डी०ओ० बोला:-’अरे, जित्ते अधर्म हम करतें है, उसका प्रायश्चित, कर लेंगें रिटायर होकर..?
इनको मालूम नहीं चित्रगुप्त ने इनकी जीवनी में सिर्फ़ पाप ही पाप लिखे हैं. ये बेचारे तो सात जन्म तक प्रायश्चित करें तो भी नहीं पाप कटेंगें . पल पल बोले झूठ का पाप, झूठी दण्डवतों का पाप,झूठी दिलासा का पाप, कमीशन-खोरी का पाप, पता नहीं क्या क्या लिख मारा चित्रगुप्त महाराज़ ने. ऊपर से बीवी को बच्चों को, बाप को,भाई को जाने किस किस को मूर्ख बनाने का पाप सब कुछ दर्ज़ किये जा रहें हैं चित्रगुप्त जी महाराज़.
खैर, छोड़िये चित्रगुप्त जी को जो करना है सो उनको
करने देते है हम इन लोगों पे आते हैं जो देश के लिये ज़रूरी भी हैं और देश की मज़बूरी भी.
मीटिंग लेने पधारे आई०ए०एस० सुजय का जीवन-दर्शन उनके चेहरे से झलक रहा था. चेहरा एक युवा साधु सा, जो अभी-अभी अपने गुरु के आदेश पर
बाहर निकला हो. बायस न था था किसी से बस उसे लग रहा था कि सारी दुनियां दूधसे धुली है जो सामने बैठी है वह दुनियां तो गाढ़े दूध से साफ़ की गई है. सामने बैठी ब्लाक-लेबल के अफ़सरों की दुनियां में उनको जो
दूध-दही-घी मक्खन सबसे धुलती है.
अफ़सर क्या इनकी पूरी खानदान दूध-दही-घी-मक्खन से धुलती है.धुले भी क्यों न भाग्य में विधाता ने लिख मारा सो लिख मारा न तो कोई अपील नहीं होती विधाता के द्वारा लिखे गयेभाग्य की और न ही कोई अपीलेट कोर्ट का प्रावधान ही रख छोड़ा है ”परलोक-प्रशासन” ने. सुजय ने सभी विभागों कीबारी बारी बात सुनी सबने दो दूनी चार वाला पहाड़ा पढ़वा दिया . यानी
सर्वत्र खुशहाली कहीं कोई कमीं नहीं, भले लंगड़को पेंशन न मिली हो, फ़त्तू को इंदिरा आवास न मिला हो, चुन्नू को टीका न लगा हो फ़िर भी योजनाएं अच्छी चल रहीं हैं. अच्छी चले न चले अच्छी चलते दिखवाना इनको आता है. सुजय को लगा वाक़ई अमन चैन है सारा तंत्र बड़ी मुस्तैदीसे काम कर रहा है. सो बस वे चल दिये जाते वक़्त बाज़ू वाले कमरे में झांकने पर उनने देखा कि कुछ पटवारी,अटैचकिये गये मतदाता सूची संबंधी काम रहे थे.उनमें से कुछने देख लिया एस०डी०एम० साब को
उठ गये सलाम ठौंकने जो न उठ पाए उनने दरी से आधा
फ़ीट उपर तशरीफ़ उठा के अभिवादन का अभिनय कर ही दिया.
एस०डी०एम० सुजय के बताए अनुसार सारे काम ठीक-ठाक किये गये जिन जिन सड़कों में गड्ढे थे उनमें थिगड़े,जिनबच्चों औरतों को टीके न लगे थे उनको टीके, आदी पूरे कराए गये कुछ के तो रजिस्टर में लग ही गये . स्कूलों के मास्टरघर घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिये अभिभावकों से लगभग गिड़गिड़ाते नज़र आने लगे थी हरेक गांव में .
पता नहीं सरकार को क्या सूझी कि सुना है कि सी०एम० सा’ब के क्षेत्र में अफ़सर दौरा नहीं करते थे उसी स्थिति से प्रेरित होकर साहब ने ये जुगत जमाई कि “भैया,तंत्र के तांत्रिको कुर्सी से उठ के बाहर गांव की लू लपट भी देखो . सूबे केसी०एम० साब ले गांव गांव पद जात्रा निकलवाई. तपती धूप में जनता के बीच किताब पड़ने की ड्यूटी लगाई. ताकि़ आम आदमी जाने कि कि उनको कैसे आगे आना है और कैसे लाभ उठाना है. एक अधिकारी के हाथ में सौंपी गई थी वोकिताब जिसे बांचना था. दल के दल गांव गांव जाते किताब बांचते फ़िरते.
रियाया की स्थिति का जायजा लेने तहसीलदार के नेतृत्व में एक दल ग्राम पिचौर पहुंचा गांव पहुंचते ही पटवारी सेव्हाया आर०आई० नायब फ़िर तहसीलदार बने शर्मा ने गांव के अंदर आते ही कोटवार के ज़रिये सरपंच को बुलावाभेजा. तब मोबाइल फ़ोन नही थे वरना पटवारी भी आधा फ़र्लांग जाने की तक ज़हमत न उठाता, जाना पड़ा बेचारे को पाजामा सम्हाला तेज़ कदमों से बुलावे के लिये रवाना हुआ क्या आवाज़ थी कोटवार की. चार खेत दूर तक पहुंच गईगांव से दूर उस खेत तक जहां कल्लू पटेल मोटर से पानी दे रहा था… पुकार ये थी..”ओ कल्लू रै सिरपंच, तहसील साबबुलात है रे………..” रे को ठीक उसी तरह खींचा जैसे सियासी पार्टियां किसी मुद्दे को बेइंतहां खींचतीं हैं .
सरपंच चिल्लाया :-”आत हौं रे तन्नक ठैर तो जा रे कुटवार तैं चल मैं आ रओ , फ़िर खेत की झाड़ियों की ओट में बैठ केशंका निवारण की जो लघु थी . नया-नया सरपंच था डरा कि कोई अपराध तो नहीं हो गया . वैसे उसने पहली कमीशनखोरी कर ली थी . स्कूल में रंगाई-पुताई,शौचालय बनाने के लिये बी०डी०ओ० दफ़्तर से मिले पांच हज़ार के चैक सेचालीस परसेंट का वारा न्यारा सी०ई०ओ० दफ़्तर के पंचायत साब के मार्गदर्शन में हुआ. साठ परसेंट में काम हुआ. उसेभय था कि शायद तहसीलदार को भनक लग गई. आज़ उसी की जांच तो नहीं. इसी भय के मारे शंका हुई शंका लघु थीसो उसका निवारण खेत में ही कर लिया, सबके सामने कैसे करता बेचारा बताओ भला ?
शंका निर्मूल थी परंतु लघु वाली शंका निर्मूल न थी. बहरहाल जो भी था मात्र भय था. उसे जब निरापद महसूस हुआ सोक़दम तेजी से आगे की ओर बड़े स्वयमेव ही. पहुंचते ही तहसीलदार सहित समस्त सरकारी अफ़सरान को नमस्कारकिया. सारी कुर्सियां भरीं थीं. प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षार्थ सबसे छोटे पद वाले अधिकारी ने कहीं जाने का बहाना करएक कुर्सी खाली ताकि सरपंच जी को आसीन कराया जा सके.हुआ भी यही
बैठो सिरपंच !… तहसीलदार का आदेशात्मक निवेदन सुन सरपंच ने कुर्सी तो सम्हाल ली लेकिन उसकी बैठने कीस्टाइल से लग रहा था कि किसी बाग के सामने बकरी को बांध दिया हो .
तहसीलदार:-कोई फ़ौती..?
सरपंच:- (कोट्वार की तरफ़ देखते हुये ) काय कुटवार भैया ! गोविंद के बाबू ..अरे हओ साब- गोविंद के पिता नईं रहे,
बातबीच में काटते हुए पटवारी बोला:- “सा’ब, गोविन्द का एक भाई भुसावल में रेलवे में है आते ही नामांतरण होजाएगा.
सरपंच:- अरे, बो तो आओ है
तहसीलदार:- तो बुलाओ उसको
बुलाने की ड्यूटी कुटवार की थी गोविंद का भाई आया और फ़िर शुरू हुई अविवादित नामांतरण की प्रक्रिया नायबतहसीलदार के मार्गदर्शन में. पंचायत के दूसरे कक्ष में ले जाकर निपटाई गई.सबके सामने ऐसे काम कैसे हों ?
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महंत कल्लू जी को गुजरे दस बरस हो गया था कुड़ारी गांव के धनिक थे नेता थे इस बार कुड़ारी की सिरपंची राष्ट्रीय झुल्ला पार्टी के सक्रीय कार्यकर्ता उद्धव के हत्थे लग गई थी जो महंत कल्लू की असली संतान थी अरे क्या आप गलत न समझें मैं मरे हुए कल्लू दादा की शान में कुछ ऐसा वैसा न कह रहा हूं. आप भी न ! पढ़ते पढ़ते मुझे ग़लत समझ बैठे उद्धव को महंत कल्लू की असली संतान कहने पर मेरा आशय है कि असली बछड़ा वही होता है जो अपने बैल बाप के खुरों का अनुशरण करे . उद्धव ऐसा असली बेटा था बाक़ी अन्य संतानों के साथ ऐसी न थीं. सो उद्दव मंत्री जी के प्रवास के दौरान एक डेलीगेशन सहित “कल्लू दादा स्मृति समारोह” की मांग जाति-गत वोट बैंक में सेंध मारी का हवाला देते हुए की. मंत्री जी ने बिना सकुचाए कलेक्टर साहब से प्रस्ताव तैयार कर भेजने को कहा.
“कल्लू दादा स्मृति समारोह” के आयोजन स्थल पर काफ़ी गहमा गहमीं थी सरकारी तौर पर जनाभावनाओं का ख्याल रखते हुए इस के सालाना आयोजन  की अनुमति की नस्ती से “सरकारी-सहमति-सूचना” का प्रसव हो ही गया था जनता के बीच उस आदेश के सहारे कर्ता-धर्ता फ़ूले नहीं समा रहे थे. समय से पूर्व बड़े दफ़्तर वाले साब ने मीटिंग लेकर छोटे-मंझौले साहबों के बीच कार्य-विभाजन कर दिया. कई विभाग जुट गए “कल्लू दादा स्मृति समारोह” के सफ़ल आयोजन के लिये कई तो इस वज़ह से अपने अपने चैम्बरों और आफ़िसों से कई दिनों तक गायब रहे कि उनको “इस महत्वपूर्ण राजकाज” को सफ़ल करना है. जन प्रतिनिधियों,उनके लग्गू-भग्गूऒं, आला सरकारी अफ़सरों उनके छोटे-मंझौले मातहतों का काफ़िला , दो दिनी आयोजन को आकार देने धूल का गुबार उड़ाता आयोजन स्थल तक जा पहुंचा. पी आर ओ का कैमरा मैन खच-खच फ़ोटू हैं रहा था. बड़े अफ़सर आला हज़ूर के के अनुदेशों को काली रिफ़िलर-स्लिप्स पर ऐसे लिख रहे थे जैसे वेद-व्यास के कथनों गनेश महाराज़ लिप्यांकित कर रहे हों. छोटे-मंझौले अपने बड़े अफ़सर से ज़्यादा आला हज़ूर को इंप्रेस करने की गुंजाइश तलाशते नज़र आ रहे थे. आल हज़ूर खुश तो मानो दुनियां ..खैर छोड़िये शाम होते ही कार्यक्रम के लिये तैयारीयों जोरों पर थीं. मंच की व्यवस्था में फ़तेहचंद्र, जोजफ़, और मनी जी, प्रदर्शनी में चतुर सेन साब,बदाम सिंग, आदि, पार्किंग में पुलिस वाले साब लोग, अथिति-ढुलाई में खां साब, गिल साब, जैसे अफ़सर तैनात थे. यानी आला-हज़ूर के दफ़्तर से जारी हर हुक़्म की तामीली के लिये खास तौर पर तैनात फ़ौज़. यहां ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इतने महान कर्म-निष्ठ, अधिकारियों की फ़ौज तैनात है कि इंद्र का तख्ता भी डोल जाएगा वाक़ई. इन महान “सरकारीयों” की “सरकारियत” को विनत प्रणाम करता हूं .
मुझे मंच के पास वाले साहब लोग काफ़ी प्रभावित कर रहे थे. अब फ़तेहचन्द जी को लीजिये बार बार दाएं-बाएं निहारने के बाद आला हज़ूर के ऐन कान के पास आके कुछ बोले. आला हज़ूर ने सहमति से मुण्डी हिलाई फ़िर तेज़ी से टेण्ट वाले के पास गये .. उसे कुछ समझाया वाह साहब वाह गज़ब आदमी हैं आप और आला-हज़ूर के बीच अपनत्व भरी बातें वाह मान गए हज़ूर के “मुसाहिब” हैं आप की क्वालिटी बेशक 99% खरा सोना भी शर्मा जाए. आपने कहा क्या होगा ? बाक़ी अफ़सरान इस बात को समझने के गुंताड़े में हैं पर आप जानते हैं आपने कहा था आला-हज़ूर के ऐन कान के पास आकर “सर, दस कुर्सियां टीक रहेंगी. मैं कुर्सी की मज़बूती चैक कर लूंगा..? आला-हज़ूर ने सहमति दे ही दी होगी.
जोज़फ़ भी दिव्य-ज्ञानी हैं. उनसे सरोकार पड़ा वे खूब जानतें हैं रक्षा-कवच कैसे ओढ़ते हैं उनसे सीखिये मंच के इर्दगिर्द मंडराते मनी जी को भी कोई हल्की फ़ुल्की सख्शियत कदाचित न माना जावे. अपनी पर्सनालटी से कितनों को भ्रमित कर चुकें हैं .
आला-हज़ूर के मंच से दूर जाते ही इन तीनों की आवाज़ें गूंज रही थी ऐसा करो वैसा करो, ए भाई ए टेंट ए कनात सुनो भाई का लोग आ जाएंगे तब काम चालू करोगे ? ए दरी भाई जल्दी कर ससुरे जमीन पे बिठाएगा का .. ए गद्दा ..
जोजफ़ चीखा:-“अर्र, ए साउंड, इधर आओ जे का लगा दिया, मुन्नी-शीला बजाओगे..? अरे देशभक्ति के लगाओ. और हां साउण्ड ज़रा धीमा.. हां थोड़ा और अरे ज़रा और फ़िर मनी जी की ओर मुड़ के बोला “इतना भी सिखाना पड़ेगा ससुरों को ”
तीनों अफ़सर बारी-बारी चीखते चिल्लाते निर्देश देते रहे टैंट मालिक रज्जू भी बिलकुल इत्मीनान से था सोच रहा था कि चलो आज़ आराम मिला गले को वरना मज़दूरों को गाली देते देते आवाज़ जगजीत सिंह की आवाज़ से ग़ुलाम अली की हो जाती है . टॆंट वाले मज़दूर अपने नाम करण को लेकर आश्चर्य चकित थे जो दरी ला रहा वो दरी जो गद्दे बिछा रहा था वो गद्दा .. वाह क्या नाम मिले .
कुल मिला कर आला हज़ूर को इत्मीनान दिलाने में कामयाब ये लोग “जैक आफ़ आल मास्टर आफ़ नन”वाला व्यक्तित्व लिये इधर से उधर डोलते रहे इधर उधर जब भी किसी बड़े अफ़सर नेता को देखते सक्रीय हो जाते थोड़ा फ़ां-फ़ूं करके पीठ फ़िरते ही निंदा रस में डूब जाते .
फ़तेहचंद ने मनी जी से पूछा :यार बताओ हमने किया क्या है..?
जवाब दिया जोजफ़ और मनी जी ने समवेत स्वरों में ;”राजकाज ”
फ़तेहचंद – यानी राज का काज हा हा हा

सरकारी महकमों में अफ़सरों को काम करने से ज़्यादा कामकाज करते दिखना बहुत ज़रूरी होता है जिसकी बाक़ायदा ट्रेनिंग की कोई ज़रूरत तो होती नहीं गोया अभिमन्यु की मानिंद गर्भ से इस विषय
का प्रशिक्षण उनको हासिल हुआ हो. इस बात को “वृक्षारोपण-दिवस समारोह ” वाली घटना से समझा जा सकता है.
अब कल्लू महंत कल्लू जी नहीं भाई ये दूसरे हैं हां तो कल्लू को ही लीजिये जिसकी ड्यूटी चतुर सेन सा’ब ने “वृक्षारोपण-दिवस” पर गड्ढे के वास्ते खोदने के लिये लगाई थी मुंह लगे हरीराम की पेड़ लगाने में झल्ले को पेड़ लगने के बाद गड्डॆ में मिट्टी डालना था पानी डालने का काम भगवान भरोसे था.. हरीराम मेम साब की सेवा में आहूत किया गया था सो वे उस सुबह “वृक्षारोपण-स्थल” अवतरित न हो सका जानतें हैं क्या हुआ..? हुआ यूं कि सबने अपना-अपना काम काज किया कल्लू ने (गड्डा खोदा अमूमन यह काम उसके सा’ब चतुर सेन किया करते थे), झल्ले ने मिट्टी डाली, पर पेड़ एकौ न लगा देख चतुर सेन चिल्लाया-“ससुरे पेड़ एकौ न लगाया कलक्टर सा’ब हमाई खाल खींच लैंगे काहे नहीं लगाया बोल झल्ले ?”
झल्ले बोला:-“सा’ब जी हम गड्डा खोदने की ड्यूटी पे हैं खोद दिया गड्डा बाक़ी बात से हमको का ?”
चतुरसेन :- औ’ कल्लू तुम बताओ , ?
कल्लू:-“का बोलें हज़ूर, हमाई ड्यूटी मिट्टी पूरने की है सो हम ने किया बताओ जो लिखा आडर में सो किया हरीराम को लगाना था पेड़ आया नही उससे पूछिये ”
सरकारी आदमी हर्फ़-हर्फ़ लिखे काम करने का संकल्प लेकर नौकरी में आते हैं सब की तयशुदा होतीं हैं ज़िम्मेदारियां उससे एक हर्फ़ भी हर्फ़ इधर उधर नहीं होते काम. सरकारी दफ़तरों के काम काज़ पर तो खूब लिक्खा पढ़ा गया है मैं आज़ आपको सरकार के मैदानी काम जिसे अक्सर हम राज़काज़ कहते हैं
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6 विचार “सर्किट हाउस 11.10.2011&rdquo पर;

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