जो अंतस में सुलग रहा है, उसको बाहर आ जाने दो


गीत प्रीत के गाने दो, प्रिय मन तक सुर जाने दो
तुम से मिल कर तेज हुई, धड़कन को समझाने दो
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मेरे प्रेमगीत में देखो -ताल तुम्हारी धड़कन की है
प्रीत है मुझसे कह देने में क्यों कर मन में अड़चन सी है
जो अंतस में सुलग रहा है, उसको बाहर आ जाने दो
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किस बंधन ने बांध रखा है, प्रीत की निर्मल सी धारा को
रुका नीर सागर का भी ,नीर तो है किंतु खारा वो
मत रोको बेवज़ह नीर को, सहस-धार से बह जाने दो
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