कुमार विश्वास का सच


जन्म: 10 फ़रवरी 1970 उपनाम जन्म स्थान पिलखुआ गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत कुछ प्रमुख कृतियाँ एक पगली लड़की के बिन (1996), कोई दीवाना कहता है (2007)

डा कुमार विश्वास हिन्दी कवि-सम्मेलन की वर्तमान धारा के सबसे अग्रणी हस्ताक्षरों में से एक हैं। उनका कवित्त और मंच प्रस्तुतिकरण, दोनों ही अत्यंत लोकप्रिय हैं। ‘युवा दिलों की धड़कन’ जैसे सम्बोधनों से पुकारे जाने वाले डा कुमार विश्वास युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं। उनकी एक मुक्तक ‘कोई दीवान कहता है’ को देश का ‘यूथ एंथेम’ (युवाओं का गीत) की संज्ञा भी दी गई है। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों, जैसे आइआइएम, आईआई टी, एन आई टी और अग्रणी विश्वविद्यालयों के सर्वाधिक प्रिय कवि डा विश्वास आज-कल कई फ़िल्मों में गीत, पटकथा और कहानी-लेखन का काम कर रहे हैं। (आगे पढ़िये)

कुमार की वेब साईट, फ़ेसबुक,आरकुट,ट्विटर,  यू-ट्यूब पर, कुल मिला कर अंतरजाल का तार पकड़ के न जाने यह गायक कब  कवि कहलाने लगा मुझे नहीं पता चल सका.  कुछ दिनों पहले ईवेंट-ग्रुप ने चाहा कि वे एक ऐसा कवि सम्मेलन आयोजित करना चाहते हैं जिसमें देश के वज़नदार कवि आएं.  मैने भी समीरलाल जी से सुन रखा था कि कुमार एक अच्छे कवि हैं… सो अन्य कवियों के अलावा कुमार से समीरलाल जी का  संदर्भ देकर उनके पारिश्रमिक की जानकारी चाही. अन्ना हज़ारे के साथ खड़े होकर बड़ी-बड़ी बात करने वाले इस युवा कवि ने जो कहा उसे सुनकार मुझे लगा शायद मैनें कोई गलत नम्बर डायल कर दिया हो . इसका खुलासा फ़िर कभी करूंगा अभी बस इतना कहना चाहता हूं कि मैने मित्र को बताया भैया भूल जाऒ ईवेंट .
जबलपुर के  एक निजी शिक्षण संस्थान के आयोजन में आज़ कुमार विश्वास ने इटारसी के कवि राजेंद्र मालवीय की एक बात को बिना उनका नाम लिये दोहराया जिसे भाई राजेंद्र जी ने एक कविता में कहा था.आज़ उसी मंच पर अलबेला खत्री को आना था किंतु कुमार ने यह जानते हुए भी कि अलबेला खत्री जी कार्यक्रम के आमंत्रित कलाकार हैं अपनी प्रस्तुति को समाप्त करते हुये ऐसा माहौल बना दिया कि अब आगे प्रस्तुति न हो सके.  किसी कलाकार का कलाकार के द्वारा किये गये अपमान करना मुझको दु:खी कर गया. बहरहाल अलबेला-खत्री के प्रति उनका यह बर्ताव साबित करता है कि शो-बिजनेस में पनप रहे इस भ्रष्ट आचरण को खत्म-करने किसी “अन्ना हज़ारे” की नितांत ज़रूरत है.
वैसे कुमार को बता देना चाहता हूं कि :- “कवि हो  हो तो किसी को आहत करने उसे अपमानित करने का हक़ नही मिल जाता  मुझे अच्छी तरह याद है कि आपने आयोजन के पारिश्रमिक को लेकर क्या कहा था  उसका खुलासा कर ही दूंगा आयकर विभाग को भी तो पता चले प्रोफ़ेसर साहब ?”
बवाल ने क्या खूब लिखा “लाल और बवाल” पर आज़ के आयोजन पर

कटाक्षे-आज़म डॉ. कुमार विश्वास जी के जबलपुर में कार्यक्रम पर उनके सम्मान में………..

बे‍अदबज़बानी, लम्पटता के क़ब्ज़े में ही आलम था !

वो साबुत लौट के इसकर गए, के सब्र हमारा कायम था !!
 

मार विश्वास ने  जबलपुर में जो हरक़त की वो ओछी थी इसमें कोई दो मत नहीं. पहली पोस्ट के के बाद जिस तरह सुधि जन सामने आए वो एक अलग अनुभव है.
ब्लागजगत ने क्या कहा देखिये आप  स्वयं
पद्मसिंह:-एक पगली लड़की को लेकर युवा मन को दीवाना बनाने की बाजीगरी में सिद्ध हस्त हैं कुमार विश्वास जी….गन्दा है पर धंदा है ये
अनूप शुक्ल : कुमार विश्वास के बारे में सम्यक विश्लेषण के लिये यह पोस्ट देखिये:
डाक्टर अजित गुप्ता:-मैंने उनके कारनामें अमेरिका में देखे हैं। आज का समाज किस ओर जा रहा है यह उनकी लोकप्रियता से ज्ञात होता है।
डा० शरद सिंह :- कुमार विश्वास जी को हार्दिक बधाई।
नुक्‍कड़ :-कुमार भी विश्‍वास भी ?
Er. सत्यम शिवम आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (09.04.2011) को “चर्चा मंच” पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये……”ॐ साई राम” at http://charchamanch.blogspot.com/
अमित के. सागर याद है कि आपने आयोजन के पारिश्रमिक को लेकर क्या कहा था उसका खुलासा कर ही दूंगा आयकर विभाग को भी तो पता चले प्रोफ़ेसर साहब ?”
उक्त सन्दर्भ में जानने को अतिउत्सुक हूँ. शेष जो कमेंट्स पढने को मिली हैं…फिर तो और भी…और भी कुछ इन के बारे में!
*-*
कवियों को भी ऐसा हो सच गर,
तो आना चाहिए बाहर हर कीमत पर
कहते हैं कि कवि तो दिल से रोटी बना खाता है
फिर कविता से भला कारोबार कैसे कर पाता है?
*-*
बवाल एक अजीबोग़रीब मंज़र कल रात देखने को मिलता है :-
एक यूथ आईकॉन नामक व्यक्ति बड़ी तन्मयता से ओल्डों की धज्जियाँ उड़ाता जा रहा है;
परम आदरणीय अन्ना हजारे जी को जबरन अपने झंडे तले ला रहा है;
अपने आपको इलाहाबादी अदब की प्रचारगाह बतला रहा है और बच्चन साहब को जड़ से भुलवा रहा है;
अपने एकदम सामने बैठे हुए स्थानीय बुज़ुर्ग नेताओं, मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष आदि पर तबियत से अपने हलाहली शब्दवाण चला रहा है;
विनोबा बाबा की प्रिय संस्कारधानी के मँच पर खड़ा या कह सकते हैं सिरचढ़ा होकर, कहता जा रहा है कि मैं उपहास नहीं, परिहास करता हूँ और उपहास ही करता जा रहा है;
जमूरों का स्व्यंभू उस्ताद बनकर अपने हर वाक्य पर ज़बरदस्ती तालियाँ पिटवा रहा है;
(इतनी तालियाँ अपनी ही एक-दूसरी हथेलियों पर पीटने से बेहतर था कि तालियाँ पिटवाने वाले के सर पर बजा दी जातीं, जिससे उसे लगातर ये सुनाई देतीं जातीं और उसे बार आग्रह करने की ज़हमत न उठाना पड़ती, समय भी बचता और …………. ख़ैर)
उसे जाकर कोई कह दे भाई के,
मैं मैं मैं मैं मैं मैं मैं,
सिर्फ़ बकरी के प्यारे बच्चे के मुँह से ही कर्णप्रिय लगती है, आदमी के (दंभी) मुँह से नहीं।
शेष टिप्पणी अगले अगले आलेख की अगली किस्त में……
—जय हिंद
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said…बढ़िया प्रस्तुति!कुमार विश्वास जी को हार्दिक बधाई।
भारतीय नागरिक ओह!
विजय तिवारी ” किसलय “ संस्कारों का सन्देश देने वाली संस्कारधानी जबलपुर में विगत ७ मार्च को एक कमउम्र और ओछी अक्ल के बड़बोले लड़के ने असाहित्यिक उत्पात से जबलपुर के प्रबुद्ध वर्ग और नारी शक्ति को पीड़ित कर स्वयं को शर्मसार करते हुए माँ सरस्वती की प्रदत्त प्रतिभा का भी दुरूपयोग किया है. टीनएज़र्स की तालियाँ बटोरने के चक्कर में वरिष्ठ नेताओं, साहित्यकारों, शिक्षकों एवं कलाप्रेमियों की खिल्लियाँ उड़ाना कविकर्म कदापि कहीं हो सकता… निश्चित रूप से ये किसी के माँ- बाप तो नहीं सिखाते फिर किसके दिए संस्कारों का विकृत स्वरूप कहा जाएगा.
कई रसूखदारों को एक पल और बैठना गवारा नहीं हुआ और वे उठकर बिना कुछ कहे सिर्फ इस लिए चले गए कि मेहमान की गलतियों को भी एक बार माफ़ करना संस्कारधानी के संस्कार हैं. महिलायें द्विअर्थी बातों से सिर छुपाती रहीं. आयोजकों को इसका अंदाजा हो या न हो लेकिन श्रोताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग भविष्य में करारा जवाब जरूर देगा. स्वयं जिनसे शिक्षित हुए उन ही शिक्षकों को मनहूसियत का सिला देना हर आम आदमी बदतमीजी के अलावा कुछ और नहीं कहेगा . इस से तो अच्छा ये होता कि आमंत्रण पत्र पर केप्सन होता कि केवल बेवकूफों और तालियाँ बजाने वाले “विशेष वर्ग” हेतु.
विश्वास को खोकर भला कोई सफल हुआ है? अपने ही श्रोताओं का मजाक उड़ाने वाले को कोई कब तक झेलेगा, काश कभी वो स्थिति न आये कि कोई मंच पर ही आकर नीतिगत फैसला कर दे.
__________________
अपने कार्यक्रम के दौरान कुमार विश्वास ने जो मंचीय अपराध किये वे ये रहे
  1. मध्य-प्रदेश के माननीय विधान-सभा अध्यक्ष मान० ईश्वर दास जी रोहाणी के आगमन पर अपमान जनक टिप्पणी
  2. श्री अलबेला खत्री जी का नाम आयोजकों पर दवाब डाल के कार्ड से हटवाया. और जब वे उड़ीसा के लम्बे सफ़र के बाद जबलपुर में कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे तो उनको “अभद्रता पूर्वक “अलबेला अलबेला का संबोधन करना.
  3. टीनएज़र्स की तालियाँ बटोरने के चक्कर में वरिष्ठ नेताओं, साहित्यकारों, शिक्षकों एवं कलाप्रेमियों की खिल्लियाँ उड़ाना कविकर्म कदापि कहीं हो सकता… निश्चित रूप से ये किसी के माँ- बाप तो नहीं सिखाते फिर किसके दिए संस्कारों का विकृत स्वरूप कहा जाएगा.
  4. भारतीय प्रेम को पाश्चात्य सेक्स से तुलना करने वाला रटा हुया जुमला
  5. इटारसी म०प्र० के कवि राजेंद्र मालवीय की कविता को अपने साथ हुई घटना के रूप में व्यक्त करना
  6. वयोवृद्ध  श्रीयुत रोहाणी जी के समक्ष स्वल्पहार रखते समय अभद्रता पूर्वक कटाक्ष करना.
  7. उनके प्रस्थान के समय अभद्रता पूर्वक इशारे  करना.
  8. कुछ दिनों पूर्व मुझसे एक अन्य कार्यक्रम के आयोजन के बारे मेरे द्वारा फ़ोन पर  संपर्क करने पर कहा जाना “बिल्लोरे जी,एक लाख लूंगा, किराया भाड़ा अलग से वो भी टेक्स मुक्त तरीके से  ” (आयकर विभाग ध्यान दे तो कृपा होगी.)अब आप ही निर्णय कीजिये आज़ देश भर के लिये जूझने वाले संत अन्ना-हजारे के साथ “जंतर-मंतर पर खड़े होने वाले बच्चों को रिझाने बहकाने वाले नकारात्मक उर्जा का संचार कर देने वाले भाई कुमार विश्वाश दोहरा चरित्र देश को किधर ले जा रहा है. “

सच को सुन कर युवा साथी भौंचक अवश्य होंगे. किंतु यही है कुमार साहब का सच. वैसे तो कई सच हैं जो लोग “कौन किस्सा बढ़ाए ! ” वाली मानसिकता की वज़ह से या कि सदाचार की वज़ह से कहते नहीं.

वैसे हम साहित्य प्रेमियों की नज़र में यह व्यक्तित्व अतिशय कुंठित एवम “अपनी स्थापना के लिये कुछ भी करने वाला साबित हुआ है.” जिसे यह शऊर भी नहीं कि “संवैधानिक पदधारियों से कैसा बर्ताव किया जाता है….? “
मेरी नज़र में “कुमार विश्वास” गांव में आये उस मदारी से बढ़कर नहीं जिसका हम भी बचपन में इंतज़ार करते थे .
अंत में छोटे बच्चे की तरह समझाईश कुछ यूं :-

अगर तू गीत गाता है तो बस तू गीत गाता चल
टोटकों से निकल बाहर खुद को आज़माता चल
तेरी ताक़त तेरी शोहरत नही,तेरी वफ़ादारी-
सभी मत बना रिश्ते बना तो फ़िर निभाता चल.


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