माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग


माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की से पलती आग

यौवन की दहलीज़ को पाके बनती संज्ञा जलती आग .

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एक शहर एक दावानल ने निगला नाते चूर हुए

मिलने वाले दिल बेबस थे अगुओं से मज़बूर हुए

झुलसा नगर खाक हुए दिल रोयाँ रोयाँ छलकी आग !

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युगदृष्टा से पूछ बावरे, पल-परिणाम युगों ने भोगा

महारथी भी बाद युद्ध के शोक हीन कहाँ तक होगा

हाँ अशोक भी शोकमग्न था,बुद्धं शरणम हलकी आग !

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सुनो सियासी हथकंडे सब, जान रहे पहचान रहे

इतना मत करना धरती पे ,  ज़िंदा न-ईमान रहे !

अपने दिल में  बस इस भय की सुनो ‘सियासी-पलती आग ?

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तुमने मेरे मन में बस के , जीवन को इक मोड़ दिया.

मेरा नाता चुभन तपन से , अनजाने  ही जोड़  दिया

तुलना कुंठा वृत्ति  धाय से, इर्षा पलती बनती आग  !

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रेत भरी चलनी में उसने,चला सपन का महल बनाने

अंजुरी भर तालाब हाथ ले,कोशिश देखो कँवल उगा लें

दोष ज़हाँ  पर डाल रही  अंगुली आज उगलती आग !!

  • Girish Billore Mukul

969/A-2,Gate No.04

Jabalpur M.P.

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