माचिस की तीली के ऊपर


माचिस की तीली के ऊपर

बिटिया की पलती आग

यौवन की दहलीज़ पे जाके

बनती संज्ञा जलती आग

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सभ्य न थे जब हम वनचारी

था हम सबका एक धरम

शब्द न थे संवादों को तब

नयन सुझाते स्वांस मरम .

हां वो जीवन शुरू शुरू का

पुण्य न था न पापी दाग…!

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खेल खेल में वनचारी ने

प्रस्तर-प्रस्तर टकराए

देख के चमकीले तिनके वो

घबराये फिर मुस्काये

बढा साहसी अपना बाबा

अपने हाथौं से झेली  आग…!

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फिर क्या सूझा जाने उनको

समझी आग से नाते दारी .

पहिया बना  लुडकता पत्थर

बना आदमी पूर्ण शिकारी .

मृगया कर वो देह भूनता

बन गई जीवन साथी आग …!

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माचिस की तीली के ऊपर
बिटिया की पलती आग
यौवन की दहलीज़ पे जाके
बनती संज्ञा जलती आग
£££££££££££££££
जब   विकास  का  घूमा  पहिया
तन पत्तों से ढांप लिया …,
कौन है अपना कौन पराया
यह सच हमने भांप लिया !
तभी भूख ने दल बनवाये
उगी मन मन भ्रम की आग !

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