परसाई जी बनाम आमिर खान और फुरसतिया वर्सेज़ मिसफिट


पी के ने तीन सौ  करोड़ से ज़्यादा रकम भीतर कर ली हंगामा तब मचा कि आमिर भाई एक तरफा बात करती है इस फिलम के भीतर …… आमिर बाबू बोले भाई अपुन तो आर्टिस्ट है जे बात आप निर्माता निर्देशक से कहियों  !

कोई कुछ भी कहे   एक बात तो स्वीकारनी  होगी कि इंसानी आस्थाओं के खिलाफ लोगबाग सदियों से आधी रोटी में दाल लेकर उचकते नज़र आते हैं … हमाए बाबा परसाई जी कम न थे गणेशोत्सव हो या अन्य कोई उत्सव हिन्दू धर्म के खिलाफ वो लिखना न चूकते ऐसा जबलपुर वालों का मत रहा  है । परंतु परसाई जी कट्टर भगत लोग इस बात को अस्वीकारते हैं  सारे  भगत मानतें हैं कि – “परसाई जी सभी धर्मों की कट्टरताओं के खिलाफ थे । ”

तो भगत  भाई लोग  ये  बताओ कि – किसी भी प्रकार का धार्मिक  विद्वेष के लिए  ऐसे विषय औवेसी ब्रांड वक्तव्य अथवा किसी भड़काऊ विषय को सामने  लाना ज़रूरी है क्या ?

“नहीं न……………. तो समझ लो लोग निब्बू वाले प्रकाश में ( लाइम  लाइट में ) बने रहने अथवा नोट कमाने के लिए अथवा टी आर पी के चक्कर में ऐसा काम करने से चूकते नहीं ।

अब अपने अनूप जी को ही लीजिये वे पुलिया प्रकरणों प्रकाशनोपरांत  इन दिनों परसाई जी की उक्तियों की सीरीज़  फेसबुक पर सांट रहे  हैं उनकी मित्र मंडली में हम ही एक नालायक निकले जिसने ऐन उनकी फेसबुक वाल पे अंगुली कर दी ………. अब जुकर भाई ये फाइसेलिटी प्रोवायाडे हैं तो हम फायदा उठा लिए ।

       परसाई ने केवल हिन्दुओं को निशाना बनाया था अनूप शुक्ल जी कोई और की नज़ीरें है क्या आपके पास ?
वैसे वे 
#रजनीश के खिलाफ एक प्रायोजित मुहिम के सूत्रधार थे ऐसा हमने सुना है ।

भाई साहब को हमारा सवाल गलत अवश्य लगा पर चोखा सवाल है मित्रो दोषारोपण कर हम किस किस को और क्यों आहत करना चाहते हैं ? रही परसाई जी की बात तो जान लीजिये कि बावजूद उनसे गटागट की गोलियां खाने के हम उनके हर मुद्दे को हूबहू स्वीकार लें  तो यह भी एक  तरह की सांप्रदायिकता होगी ।  मुझे परसाई जी पसंद हैं पर उनका हर अक्षर स्वीकार लूँ मुझे स्वीकारी नहीं है ।

परसाई ने  इस तरह की बात कह दी पता नहीं क्यों  धर्मों को दोष  दिया परसाई ने शायद उनने  धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने के बाद एक भी अच्छी बात परसाई को न मिली उन में तो मुझे उनकी शैली में  ही कहना पड़ रहा है कि – परसाई भगत ने उनको गलत चश्मा पकड़ा दिया होगा ।

कोई बात नहीं ….. होता रहता है बड़े बड़े शहरो में ऐसी छोटी छोटी बात होती ही हैं । हिन्दुत्व क्रिश्चियनिटी इस्लाम सबकी अच्छी एवं मानवता पोषक बातों को हाइलाइट कीजिए अनूप शुक्ल जी सहित उन सभी से मेरा निवेदन है जो  कि सनातन की ज़्यादा भद्द पीटने आमादा हैं कि भाई धर्म के नाम पर किसी को प्रोवोग न किया जावे …. दु:खी तो कतई न करें वरना इसके दुष्परिणाम ही सामने आएंगे ।

समय सदभाव को गति देने का है न कि फिजूल में मुद्दे उछालने का ।  आजकल  अधिकतर लेखक / फ़िल्मकार / सोशल-साइट वीर, ब्लागर, नेता धर्मगुरू  बिक जाने योग्य यानि सेलेबल मुद्दे उछलते है ।  मुद्दे उछालते हैं ।

पी के फिल्म पी के की खिलाफत न होती अगर फिल्मकार समझदारी से मुद्दा उठाते , आप आज नहीं कल स्वीकारेंगे कि पी के एकतरफा फिल्म है ।

मुद्दे पर आता हूँ मैंने फुरसतिया जी की वाल पर लिखा –

परसाई ने केवल हिन्दुओं को निशाना बनाया था अनूप शुक्ल जी कोई और की नज़ीरें है क्या आपके पास ?

वैसे वे ‪#‎रजनीश के खिलाफ एक प्रायोजित मुहिम के सूत्रधार थे ऐसा हमने सुना है ।

ये लिखने की वजह थी किसी  धर्म पर निशाना लगाने से क्या हो सकता है …. और देखना यह भी था कि वास्तव में केवल एक  समूह विशेष के बारे में लिखने वाले कितने साहसी हैं ………. मित्रो आगे के कुछ संवाद से आप समझ ही  जाएंगे

अनूप शुक्ल आप तो बचपन से परसाई जी से मिलते रहे हो। इत्ता ही जानते हो परसाई जी को। अफ़सोस हुआ आपकी टिप्पणी से। पढ़ो उनका लिखा हुआ।

  Mukul जी पढ़ा है पढ़ूँगा भी …… उनके हाथ से गटागट की गोलियां भी खाईं हैं । मैं खुले तौर पर इस बात को सामने लाना चाहता हूँ कि परसाई कालीन परिस्थियों पर भी विमर्श हो ।

 Mukul आप अफसोस ज़ाहिर न करें मैं वो पहला व्यक्ति हूँ जिसने परसाई जी के भोला राम के जीव को पढ़कर संकल्प लिया था कि अफसर बना तो किसी भी मातहत को इस तरह दु:खी न होने दूंगा । ऐसा किया भी …. 1991 में मुझे अवसर मिला भी । इसका ये अर्थ नहीं कि ” मैं टार्च बेचने वाले को स्वीकार लूँ ”

अनूप शुक्ल परसाईजी ने हर धर्म की कट्टरता के खिलाफ लिखा है। लेकिन पिटे अपने धर्म के कट्टरपंथियों से हैं। अफ़सोस इसलिए कि आपने लिखा क़ि उन्होंने सिर्फ हिंदुओं को निशाना बनाया है । परसाई जी से परिचित व्यक्ति से यह तो अपेक्षा रखी जा सकती है कि वह उनके बारे में इतनी तो समझ रखे ।

 Mukul वही तो पूछ रहा हूँ कि परसाई जी ने अन्य के बारे जो लिखा उसे आप आज पोस्ट कर पाएंगे ………… मैं उन नज़ीरों को सामने लाने की बात ही तो कर रहा हूँ ……… जीनामे यूनाने अन्य सभी कुरीतियों को उजागर किया है अनूप शुक्ल जी

Mukul मैंने आपको अपनी राय नहीं दी वरन एक सवाल पूछा हा… ? चिन्ह के पहले ये ही लिखा है न ……………… ” परसाई ने केवल हिन्दुओं को निशाना बनाया था अनूप शुक्ल जी कोई और की नज़ीरें है क्या आपके पास ?
वैसे वे #रजनीश के खिलाफ एक प्रायोजित मुहिम के सूत्रधार थे ऐसा हमने सुना है । ”

इसके बाद फुरसतिया जी ने कुछ भी नहीं कहा ………………….

आमिर भी मौन हैं ………………….. सेंसर बोर्ड तो पहले ही नेत्र विकार से ग्रस्त है ……… कुल मिला के सबकी दुकान अपने अपने तरीके से चलती है चलती रहेगी ।

मैं आसानी से स्वीकार कर लूं तुम्हारा निर्णय ? : सखि सिंह


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तुमने कह तो दिया बड़ी ख़ामोशी से कि मुझे अपनी जिंदगी में शामिल कर लो.
इसका अर्थ पता है क्या है ..अपनी जिंदगी में तुम्हारे हवाले कर दूँ. पर क्या अपनी जिंदगी की डोर तुम्हारे हाथो में देकर में सुकून के दो पल बिता सकूंगी ?
ऐसे कैसे मैं आसानी से स्वीकार कर लूं तुहारा निर्णय ? पर फिर तुम्हारा अडिग होकर अपने निर्णय से बार बार मुझे अवगत करना और कहना क्यों डरती हों तुम ? मैं हू न हर हाल में तुम्हारे साथ . तुमको कभी कोई कष्ट न हों इस बात का ध्यान में सदैव रखूँगा . नहीं मुझे डर लगता है …ये प्यार व्यार कि बाते अपनी समझ से परे है ..बिना बात के अपने दिल को कष्ट दूँ मैं इतना बड़ा काम मैं नहीं कर पाऊँगी .फिर वोही मनुहार कि बात और धीरे धीरे तुम्हारे विश्वास ने मेरे अंदर अपना घर कर लिया.अब आज क्या हुआ ? कुछ समझ नही आया …जितने भी नकारात्मक विचार थे सब मन में एक केक करके आ रहे थे और अगर नहीं कुछ आया तो वो था तुम्हारा कोई किसी भी माँध्यम से सन्देश .न फोन आया , न कोई फोन पे मेसेज और न हों यहाँ फेसबुक में कोई खबर. तुम खुद भी नहीं मिले किधर भी . जब हर और अँधेरा घिरा लगे और उम्मीद कि कोई किरण जब हमें नज़र नहीं आती है तो मन और दिल में ठन जाती है ..मन कहता है ऐसा है दिल कहता नहीं ऐसा कुछ नहीं है . अब किस बात पे यकीन कैसे आये कुछ समझ नहीं आता . बस एक उम्मीद और एक आस अब है पास…कि शायद …हां शायद ही तो वह शब्द है जो अक्सर हमें एक उम्मीद देके चला जाता है भले ही उस उम्मीद के सहारे हम फिर अपना पूरा जीवन गुजार दें .

मौन के बिस्तर पर पड़ी
दम तोडती
कितनी ही भावनाये,
आखिर कार दम
तोड़ ही गयी
इस मन के भीतर के
कोलाहल में .!!

सखि सिंह जी फ़ेस बुक पर

भारतीय राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ कसम


     राम धई, राम कसम, अल्ला कसम, रब दी सौं, तेरी कसम, मां कसम,पापा कसम, आदि कसमें भारत का  लोकप्रिय खाद्य पदार्थ हैं. इनके खाने से मानव प्रजाति को बहुत कुछ हासिल होता है. चिकित्सालय में डाक्टर बीमारी के लिये ये खाना वो मत खाना जैसी सलाह खूब देते हैं पर किसी चिकित्सक ने कसम नामक खाद्य-पदार्थ के सेवन पर कभी एतराज़ नहीं जताया. न तो किसी वैद्य ने न हक़ीम ने, और तो और  चौंगा लगा के  फ़ुटपाथ पे ज़वानी बचाए रखने वाली दवा बेचने वाले भाईयों तक ने इसको खाने से रोका नहीं. 
  यानी कुल मिला कर क़सम किसी प्रकार से नुक़सान देह नहीं डाक्टरी नज़रिये से. क़ानूनी नज़रिये से देखिये फ़िल्मी अदालतों में कसम खिलावाई जातीं हैं. हम नौकरी पेशा लोगों से सेवा पुस्तिका में कसम की एंट्री कराई जाती है. और तो और संसद, विधान सभाओं , मंत्री पदों अन्य सभी पदों पर चिपकने से पेश्तर इसको खाना ज़रूरी है. 
    कसम से फ़िलम वालों को भी कोई गुरेज़ नहीं वे भी तीसरी कसम,कसम  सौगंधसौगंध गंगा मैया के … बना चुके हैं. गानों की मत पूछिये कसम  का स्तेमाल  खूब किया है गीतकारों ने. भी. 

          मान लीजिये कभी ये  राम धई, राम कसम, अल्ला कसम, रब दी सौं, तेरी कसम, मां कसम, जैसी जिन्सें आकार ले लें और ऊगने लगें तो सरकार कृषि विभाग की तर्ज़ पर “कसम-विभाग” की स्थापना करेगी बाक़ायदा . सरकार ऐसा इस लिये करेगी क्योंकि – यही एक खाद्य-पदार्थ है जो सुपाच्य है. इसे खाने से कब्ज़ जैसी बीमारी होना तो दूर खाद्य-जनित अथवा अत्यधिक सेवन से उपजी बीमारियां कदापि न तो अब तक किसी को हुई है न इन के जिंस में बदल जाने के बाद किसी को हो सकती है. चिकित्सा विज्ञान ने तो इस पर अनुसंधान भी आरंभ कर दिये हैं. बाक़ायदा कसम-मंत्रियों  का पद भी ईज़ाद होगा. इसके लिये विधेयक संसद में लाया जावेगा. 
      पैट्रोल-डीज़ल-गैस की तरह इनकी कीमतों में बदलाव जब जी चाहे सरकार कर सकती है. 
 कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनको कसम खाना भी नहीं आता दिल्ली वाले फ़ेसबुक स्टार 
   राजीव तनेजा  इनमें से एक हैं सौगंध राम की खाऊं कैसे ? वे लिखते हैं अपनी कविता में 
कारस्तानी कुछ बेशर्मों की 

शर्मसार है पूरा इंडिया, 
अपने में मग्न बेखबर हो ?
वीणा-तार झनकाऊं कैसे ?

सौगंध राम की खाऊं कैसे..?
                             इस तरह की लाचारी उनकी होगी जिनके पास हमारे मुहल्ले के पार्षद उम्मीदवार राम-रहीम की कसम खाने में *सिद्धमुख हैं. इस मामले में वे पूरे सैक्यूलर नज़र आते हैं आप समझ गए न कसम क्यों खाई जाती है.. कसम भी सेक्यूलर होती है.. ये तय है.. कभी कभी नहीं भी होती. 
   

             खैर ये जब होगा तब सोचिये अभी तो इससे होने वाले लाभों पर एक नज़रफ़ेरी कर ली जाए 

  1. सच्ची-कसमें- इस प्रकार की कस्में अब दुनियां के बाज़ार से लापतागंज की ओर चलीं गईं हैं. लापतागंज है कहां हमको नहीं मालूम.. जैसे झुमरी-तलैया के बारे में बहुत कम लोग जानतें हैं.. कई तो उसे काल्पनिक स्थान मान चुके है वास्तव मे विकीपीडिया के अनुसार “झुमरी तिलैया भारत के पूर्वांचल में स्थित झारखंड प्रांत के कोडरमा जिले का एक छोटा लेकिन मशहूर कस्‍बा है। झुमरी तिलैया को झुमरी तलैया के नाम से भी जाना जाता है। यहां की आबादी करीब 70 हजार है और स्‍थानीय निवासी मूलत: मगही बोलते हैं। झुमरी तलैया कोडरमा जिला मुख्‍यालय से करीब छ: किमी दूर स्थित है। झुमरी तलैया में करीब दो दर्जन स्‍कूल और कॉलेज हैं। इनमें से एक तलैया सैनिक स्‍कूल भी है।
    दामोदर नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ को रोकने के लिए बनाए गए तलैया बांध के कारण इसके नाम के साथ तलैया जुड़ा है। इस बांध की ऊंचाई करीब 100 फीट और लंबाई 1200 फीट है। इसका रिजरवायर करीब 36 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। काफी हरा-भरा क्षेत्र होने के कारण यह एक अच्‍छे पिकनिक स्‍थल के रूप में भी जाना जाता है।
    झरना कुंडतलैया बांध और ध्‍वजाधारी पर्वत सहित यहां कई पर्यटन स्‍थल भी हैं। इसके अलावा राजगिरनालंदा और हजारीबाग राष्‍ट्रीय पार्क अन्‍य नजदीकी पर्यटन स्‍थल हैं। झुमरी तलैया पहुंचने के लिए नजदीकी रेलवे स्‍टेशन कोडरमा है जो नई दिल्‍लीकोलकाता रेलमार्ग पर स्थित है।

    झुमरी तलैया को अक्‍सर एक काल्‍पनिक स्‍थान समझने की भूल कर दी जाती है लेकिन इसकी ख्‍याति की प्रमुख वजह एक जमाने में यहां की अभ्रक खदानों के अलावा यहां के रेडियो प्रेमी श्रोताओं की बड़ी संख्‍या भी है। झुमरी तलैया के रेडियो प्रेमी श्रोता विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रमों में सबसे ज्‍यादा चिट्ठियां लिखने के लिए जाने जाते हैं।” वैसे ही लापतागंज जहां  भी है है तो ज़रूर …. वहां सच्ची कसमें मौज़ूद हैं

  2. झूठी कसमें :-  ये हर जगह मौजूद हैं आप के पास भी.. मेरे पास भी .. इसे खाईये और अच्छे से अच्छा मामला सुलटाइये. सच मानिये इसे खाकर आप जनता को पटाकर आम आदमी (केजरी चच्चा वाला नहीं )   से खास बन सकते हैं. याद होगा  श्री 420 वाले राजकपूर साहब ने मंजन इसी प्रकार की कसम खाकर बेचा था. आज़कल भी व्यापारिक कम्पनियां राजू की स्टाइल में पने अपने प्रोडक्ट बेच रहीं हैं. क्या नेता क्या अफ़सर क्या मंत्री क्या संत्री अधिकांश  के पेट इसी से भरते हैं . खबरिया बनाम जबरिया चैनल्स की तो महिमा अपरम्पार है कहते हैं .. हमारी खबर सबसे सच्ची है.. ! देश का बच्चा बच्चा जानता है कि सच क्या है . 
  3.  सेक्यूलर कसम :- इस बारे में ज़्यादा कुछ न कहूंगा. हम बोलेगा तो बोलेगे कि बोलता है. 
  4.  दाम्पत्य कसम  :- अक्सर पति पत्नी एक दूसरे के सामने खाते हैं जो उन सात कसमों से इतर होतीं हैं.. जो शादी-नामक भयंकर घटना के दौरान खाई जाती है.इस तरह की कसम पतिदेव को ज़्यादा मात्रा में खानी होती है. पत्नी को दाम्पत्य कसम  कभी कभार खानी होती है . 
  5. इन लव  कसम  :- यह कसम यूं तो विवाह जोग होने के बाद आई एम इन लव की स्थिति में खाना चाहिये परंतु ऐसी कसम आजकल नन्हीं पौध तक खा रही है. एकता कपूर जी की कसम आने वाले समय में बच्चे ऐसी कसमें पालनें में खाएंगे. 
  6. सियासी-कसम  :-  सियासी कसम के बारे में भगवान कसम कुछ बोलने का मन नहीं कर रहा …!! 

                        जो भी हो हम तो कसम के प्रकार बता रहे थे भगवान कसम  भाववेश में कुछ ज़्यादा ही कह गए. माफ़ी हो. मुद्दे की बात ये है कि जो भी आजकल कसम खा रहा नज़र आए तो समझिये वो झूठा है. सच्ची वाली कसमें तो लापतागंज चलीं गईं. 

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नोट- 
 
·        *सिद्धमुख =सिद्धहस्त की तरह का शब्द है. जिन लोगों में मुंह से हर काम निपटाने का हुनर आता है उनके मुंह  सिद्धमुख होते हैं. 
 
·        इस आलेख का सारा कंटेंट होली का माहौल बनाने के लिये है जिसे बुरा लगा हो वो ऐसे आलेख न पढ़ने की कसम खा सकता है.  

दण्ड का प्रावधान उम्र आधारित न होकर अपराध की क्रूरता आधारित हो ऐसा !”


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भारतीय न्याय व्यवस्था ने एक बार फ़िर साबित कर दिया है कि -भारतीय न्याय व्यवस्था बेशक बेहद विश्वसनीय एवम विश्वास जनक है. दामिनी के साथ हुआ बर्ताव अमानवीय एवम क्रूरतम जघन्य था. सच कितने निर्मम थे अपराधी उनके खिलाफ़ ये सज़ा माकूल है. जुविलाइन एक्ट की वज़ह से मात्र तीन बरस की सज़ा पाने वाला अपराधी भी इसी तरह की सज़ा का पात्र होना था . किंतु मौज़ूदा कानून के तहत लिए गए निर्णय पर टीका टिप्पणी न करते हुये एक बात सबके संग्यान में लाना आवश्यक है कि – “यौन अपराधों के विरुद्ध सज़ा एक सी हो तो समाज का कानून के प्रति नज़रिया अलग ही होगा.”

सुधि पाठको ! यहां यह कहना भी ज़रूरी हो गया है कि- यौन अपराध, राष्ट्र के खिलाफ़ षड़यंत्रों, राष्ट्र की अस्मिता पर आघात करने वाले विद्रोहियों, आतंकवादियों के द्वारा की गई राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से कम नहीं हैं . अतएव इस अपराध को रोकने कठोरतम दण्ड के प्रावधान की ज़रूरत है. इतना ही नहीं ऐसे आपराधिक कार्य में अवयष्क को उसकी अवयष्कता के आधार पर कम दण्ड देना सर्वथा प्रासंगिक नहीं है. राज्य के विरुद्ध अपराध के संदर्भ में देखा जाये तो यदि कोई कम उम्र का (अवयष्क) व्यक्ति विधि विवादित है तो उसे क्या इस अल्प दण्ड से दण्डित कर सपोले को पनपने का मौका देना उचित होगा..? मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि दण्ड का प्रावधान उम के अनुसार न होकर अपराध की क्रूरता पर अवलम्बित होना चाहिये. राज्य द्वारा इस प्रकार के सुझाव पर अमल करते हुए नये क़ानून के निर्माण की शुरुआत कर ही देनी चाहिये. बी बी सी में प्रकाशित साक्षात्कार अनुसार लीडिया गुथ्रे जो एक समाज सेविका है ने कहा-“जब पहली बार मैं एक यौन अपराधी से मिलने गई तो मेरी टांगें कांप रही थीं. जैसै- तैसे मैं सीढियां उतर रही थी.

दिमाग में यही चल रहा था कि एक दड़बे जैसे कमरे में बैठकर मैं उस आदमी से कैसे बात कर

पाऊंगीं जिसने इतना भयानक काम किया था.” – लीडिया के सुधारात्मक कार्यक्रम से व्यक्तिगत रूप मैं सहमत नहीं क्योंकि जब वे स्वयम यौन आक्रमणकारी अपराधी को सदाचार का पाठ पढ़ाने गईं तब वे भयातुर थीं. यानी यौन अपराधी में सुधार सहजता से हो पाने पर वे स्वयम सशंकित हैं.. तो समाज ऐसे व्यक्ति को किस तरह स्वीकार करेगा.
यहां घोर आदर्शवादिता का शिकार होना लाज़िमी नहीं है. यौन अपराध अन्य सभी क्रूरतम अपराधों के समकक्ष ही है. अतएव यौन अपराध को क्रूरतम अपराध की श्रेणी में रखा जाकर कठोर दण्ड के प्रावधान का समावेश मौज़ूदा क़ानूनों में किया जा सकता है. साथ ही दण्ड ” दण्ड का प्रावधान उम्र आधारित न होकर अपराध की क्रूरता आधारित हो ऐसा !” सोचिये अगर क़साब की उम्र अपराध करते वक्त १७ बरस ११ माह के आस पास होती तो क्या दशा होती ?

सुबह सलोनी कहां रात बिन ?


शाम अधूरी मीत   याद बिन

उसनींदे दिन मीत साथ बिन !

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हम तो तंतु कसे कसे से

ठोकर से सरगम ही देंगे

सर ढोऎंगें तपन पोटली

अपने तलतट छांह ही देंगें !

 क्योंकर मन में अवगुंठन है 

शाम सुहानी कहां प्रात बिन ?

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मोहक मादक मदिरा भीनी

ओढ़ चुनरिया तापस लीन्हीं

मिलन यामिनी सपनन देखूं

तुम अनदेखे मैं अनचीन्हीं !

अब तो मन में अनुगुंजन है

सुबह सलोनी कहां रात बिन ?

***************

 

 

कल का भय


समय
हौले हौले
आंखों से
नीद चुरा
बीत गया
तुम
अल्ल सुबह
मुझे
एक प्याला
चाय के
साथ
दुलार से जगाती हो
और
मैं कह नहीं पाता
आज
फिर
पूरी रात
जागा हूँ
एक अदद
कल को लेकर
की कैसा होगा ?
सच बेवज़ह डरा डरा जागा
तुम जो हो
साथ
हर कल को
सार्थक बनाने
ये बात
अब न बिसरूंगा

गिरीश मुकुल